Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 5, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 5, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
सर्वमात्मैव सर्वत्र सर्वदा भाविताकृतिः ।
इदमन्यदिदं चान्यदित्यसत्कलना कुतः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
सदा स्फुरणाकार आत्मा ही सर्वत्र विद्यमान है, सव कुछ इस
प्रकार के आत्मा का ही स्वरूपभूत है, यह दूसरा है, यह तदपेक्षया दूसरा है इत्यादि असत् कल्पनाएँ
कहाँ से आई ?