Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 5, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 5, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
कलङ्क आत्मनः कस्मात्कथं चेत्यादिसंशयः ।
नूनं निर्मूलतां यातो मृगाङ्काग्रे यथा तमः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
चिदेकरस आत्मा में अज्ञान आदि कलंक किस निमित्त से आये, वे स्वप्रकाश
आत्मा में किस तरह रह सकते हैं ? वे असंग अपरिच्छिन्न आत्मा को केसे आवृत कर सकते हैं ?
कूटस्थ आत्मा को सांसारिक विकारों का अनुभव कैसे ? इत्यादि संशय उसके हेतु अज्ञान के विनाश से
निश्चितरूप से विनष्ट हो गये