Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 12

ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त बारहवाँ सर्ग॑ बाहर से रोग एवं संग से शून्य और भीतर से स्वच्छ एवं आत्मस्वरूप से प्रकाशमान, गुरु वसिष्ठ द्वारा कही गई जनकादि ऋषियों की स्थिति का श्रीरामजी ने ग्रहण किया - यह वर्णन |

28 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी,पूर्वसर्ग मे दर्शित निश्चयवाले अतएव पापरहित, सद्रूप…
  2. Verse 2बाहर से जिनकी बुद्धि पूर्ण है अर्थात्‌ जिन्होंने त्वंपदार्थं का शोधन कर लिया है, अतएव बाह…
  3. Verse 3इस प्रकार वे जीवन्मुक्त महात्मा, नारायण की भुजाओं के सदृश, सूक्ष्मतम भी लक्ष्य का यानी ब्…
  4. Verse 4उनका समद्गृष्टि से विहार बतलाते हैं । श्रीरामजी, जैसे देवता लोग स्वर्ग मेँ रमण करते हैं,…
  5. Verse 5फूलों से पूर्ण, झूले के आन्दोलनों से चंचल चित्र-विचित्र वनों की पंक्तियों में एवं मेरूपर्…
  6. Verse 6जिनमें शत्रुओं को जीत लिया गया है, जो छत्र एवं चामर से युक्त हैं, जिनमें धर्म, अर्थ एवं क…
  7. Verse 7वे अनेक प्रकार के शिष्टाचारों से अनुष्ठित इन सभी धर्मो का स्वयं अनुष्ठान करते थे । इसी प्…
  8. Verse 8दृष्ट-अदृष्ट साधनसम्पत्तियों से रमणीय, स्त्रियों की हँसी के सदूश मनका अपहरण करनेवाले और व…
  9. Verse 9कमनीय आग्रवृक्षों से युक्त, मन्दार की मालाओं से परिवेष्टित, अप्सराओं के मनोहर गीतों से पर…
  10. Verse 10चराचर भूतो से युक्त समस्त भुवनो में, निखिल प्राणियों के सुखों के साधन यज्ञादि क्रियाकलापो…
  11. Verse 11जिनमें अनेक बड़े-बड़े हाथी मारे गये हैं, अनेक श्रगाल (सियार) और श्रृगाली जिनमें परिभ्रमण…
  12. Verse 12जिनमें चित्त को क्लेश सहना पड़ता है, जो धन का अपहरण किये हुए शत्रुओं से पराभूत हैं तथा क्…
  13. Verse 13उन जीवन्मुक्तो का मन राग से शून्य, उपाधिरहित, अभ्रान्त, आसक्ति से शून्य, मुक्त, चारों ओर…
  14. Verse 14इसीलिए बड़े-बड़े संकट भी उनके पास पहुँचे या सर्वातिशायी ऐश्वर्य को भी वे प्राप्त होवें, क…
  15. Verse 15हे रघुकुल शिरोमणे श्रीरामजी, जैसे पूर्णचन्द्र की कान्ति से समुद्र उल्लास को प्राप्त होता…
  16. Verse 16तत्त्ववेत्ता का मन दुःख एवं शोक से, ग्रीष्मकाल में वनस्थल की नाई, मलीनता को (मुरझाहट को)…
  17. Verse 17हे श्रीरामजी, वे तत्त्ववेत्ता महात्मा कर्तृत्वअभिमान से रहित होकर भोगरूपी मंजरियों का अनु…
  18. Verse 18वे शत्रुजय आदिरूप संपत्ति प्राप्त होनेपर न उत्कर्ष को प्राप्त होते थे और न शत्रुओं से आक्…
  19. Verse 19मोह के कारणभूत दुःखों के प्राप्त होने पर न मोहित होते थे और न विपत्तियों के आक्रमणों से व…
  20. Verse 20अपने-अपने वर्णाश्रमो के अनुकूल सदाचार से प्राप्त विषयों मेँ केवल कर्म करते हुए क्रोधरहित…
  21. Verse 21हे राघव, पापों का नाश करनेवाली तत्त्ववेत्ता जीवन्मुक्तो की उस दृष्टि का अवलम्बन कर आप अहं…
  22. Verse 22श्रीरामजी, इसी सृष्टि की परम्परा को यथास्थित दृष्टि से देखते हुए आप मेरुपर्वत की तरह स्थि…
  23. Verse 23वह यथाभूत दर्शन कैसा है ? इस शंका पर कहते हैं। श्रीरामजी, इस प्रकार प्रतीत होनेवाला यह सम…
  24. Verse 24हे कल्याणकारी श्रीरामजी, ब्रह्मरूपता का पर्याप्त अवलम्बन कर ओर संसार का अनादरपूर्वक त्याग…
  25. Verse 25हे शान्त श्रीरामचन्द्रजी, अत्यन्त उद्वि्मतापूर्वक आप क्यों रो रहे है, मूढ की तरह शोक क्यो…
  26. Verse 26श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्‌, आपकी कृपा से मेरे अज्ञानरूपी मलका भली प्रकार क्षय हो…
  27. Verse 27शरत्काल में कुहरे की नाई मेरी भ्रान्ति नष्ट हो गयी है । अब सम्पूर्णं सन्देहं से शान्त हुआ…
  28. Verse 28हे साधो, मेरा मद ओर मोह निकल गया, मैं मान एवं मात्सर्य अर्थात्‌ डाह से रहित हो चुका । अत्…