Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 12, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 12, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
रेमिरे वनखण्डेषु द्वीपेषु नगरेषु च ।
देवोपवनमालासु स्वर्गेषु च सुरा इव ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उनका समद्गृष्टि से विहार बतलाते हैं ।
श्रीरामजी, जैसे देवता लोग स्वर्ग मेँ रमण करते हैं, वैसे ही ये जीवन्मुक्त महात्मा लोग वन-
खण्डो, द्वीपों, नगरों तथा देवताओं के उपवनों में अर्थात् उद्यानमालाओं में रमण करते थे यानी समदृष्टि
होकर वे सर्वत्र समानभाव से विहार करते थे, यह भाव है