Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 12, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 12, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
तां त्वं दृष्टिमवष्टभ्य राघवाऽघविनाशिनीम् ।
अनहंकृत्यहंकारो विहरस्व यथाक्रमम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राघव, पापों का नाश करनेवाली तत्त्ववेत्ता जीवन्मुक्तो की उस दृष्टि का अवलम्बन कर आप
अहंकृतिरूप दोष से पृथक् किये गये शुद्ध चिन्मात्र में आत्मबुद्धि करते हुए यथा प्राप्त व्यवहार के
अनुसार विहार कीजिए