Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 89
सत्तासीवाँ सर्ग समाप्त अट्टासीवाँ सर्ग वीतहव्य के विमुक्त होने पर हृदय में उनके प्राणों का लय हुआ, कारण में देह का लय और कलाओं का लय हुआ, यह वर्णन ।
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- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी उक्त रीति से संसार की अवधि के अन्तिम स्थानभूत पर…
- Verses 2–3महामुनि वीतहव्य के उस प्रकार परम विश्रान्त होने पर निरतिशयसुखात्मक मोक्ष को प्राप्त हो जा…
- Verse 4समस्त देह में व्याप्त होकर रहनेवाले प्राणों का हृदय में उपसंहार कहते है। देहरूपी वृक्ष के…
- Verse 5इति तु पचम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति तद्यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामुपादाय" इत्यादि श्…
- Verse 6लिंग शरीर में प्रतिबिम्बित जीवभूता चिति स्वबिम्बभूत चैतन्य-समुद्र में जा मिली । त्वचा-असृ…
- Verse 7उपसंहार करते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, महामुनि वीतहव्य की यह सैकड़ों विचारों से समन्वित वि…
- Verse 8हे राघव, इस प्रकार की रमणीय अपनी उत्कृष्ट विचारधारा से तत्व का अवलोकन कर उक्त सार का ग्रह…
- Verses 9–10अब भगवान् वस्निष्ठजी कृपा के आधिक्य से कहे गये, कहे जा रहे और कहे जानेवाले ग्रन्थ का; चि…
- Verse 11हे महामते, इस निर्मल दृष्टि का अवलम्बन कर उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त करो, क्योकि ज्ञान से…
- Verse 12हे श्रीरामजी, ज्ञान से ही मनुष्य दुःख के अभाव को प्राप्त होता है, ज्ञान से अज्ञान का विना…
- Verse 13ज्ञान से समस्त आशाओं का चारों ओर से खण्डन कर महामुनि वीतहव्य अपने चित्तरूपी पर्वत को निःश…
- Verse 14महामुनि वीतहव्य ने अपने हृदय में संकल्पमय जगत् का और उसमें गणत्व का अनुभव किया, ऐसा पहले…
- Verse 15इससे भी यही वह जगत् था, ऐसा कहते हैं। हम लोगों के चक्षु आदि से दिखलाई पड़ रहे मुनि वीतहव…
- Verses 16–68उपाधियों से तथा इन उपाधियों से होनेवाले प्रियादि-संगों से रहित थे, वह विवेकी वीतहव्य मुनि…