Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 89, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 89, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
बहवो विदितात्मानो विहरन्तीह भूतले ।
न केचन वशं यान्ति दुःखस्याङ्ग भवानिव ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इति तु पचम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति तद्यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामुपादाय" इत्यादि
श्रुति के अनुसार तथा (तदनन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् इत्यादि बादरायणसूत्र
के अनुसार पहले के जन्मो मे अनुष्ठित अग्निहोत्र आदि कर्मोमिं समवायी अपृशब्दवाच्य सोम, आज्य. पय
आदि भूतमात्राओं से युक्त ही लिगशरीर की - जो चन्द्रमण्डल में आरूढ है, भोग के अन्तर्मे आकाशादि
क्रम से पृथ्वी में व्रीही, यव, पुरुष और योषित्-रूपी अग्नि मे प्रवेश करने से पुरुषाकारता की प्राप्ति का
अवगम होने से उन भ्रूतमात्राओं का कारण में अनुप्रवेश कहते हैं।
प्राण से लेकर नाम पर्यन्त सोलह कलाओं से युक्त भूत पृथ्वी आदि महाभूतों में ही लीन हो गये
और जो पिता और माता के मल से उत्पन्न स्थूल अंश स्वरूप मांस, अस्थि ओर आँत-रूपी देह था,
वह अरण्य में पृथ्वीतल में मिल गया