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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 25

चौबीसवाँ सर्ग समाप्त प्रचीसवाँ सर्ग सन्देह की निवृत्ति के लिए शुक्राचार्य के चिन्तन की इच्छा से बलि के हृदय में विवेकरूपी चन्द्रमा के शुभोदय का वर्णन |

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  1. Verses 1–2बलि ने कहा : सुन्दर विचारवाले मेरे पिता ने यह पहले मुझसे कहा था। इस समय भाग्य से मुझे इसक…
  2. Verses 3–6पुनः पुनः अपनी आशा को पूर्ण कर रहा, पुनः पुनः धन बटोर रहा एवं पुनः पुनः प्रिया को प्रार्थ…
  3. Verses 7–8अब धनोपार्जन के फलरूप स्त्री आदि का भोग भी असार है, ऐसा विचार कर उनके लिए शोक करते हैं। प…
  4. Verses 9–10नया चमत्कार न दिखाई देने और चर्वितचर्वण रूप होने से भी ऐहिक ओर पारलौकिक भोगो मे सार नहीं…
  5. Verses 11–14जो कुछ भोग अज्ञानियों की दृष्टि में सारभूत प्रतीत होता है, वह भी नश्वर होने से अन्त में द…
  6. Verse 15अत्यन्त चंचल तृष्णा वाले अज्ञानी मेने इस त्रिजगत में इतने पश्चात्ताप की अभिवृद्धि के लिए…
  7. Verse 16अथवा बीते हुए के लिए शोक करने से क्या प्रयोजन है ? अब मैं वर्तमान मोह चिकित्सा द्वारा पुर…
  8. Verse 17जैसे अपरिच्छिन्न स्वरूप ब्रह्म के साथ अभेद स्थिति से आत्मा में चारों ओर से पूर्ण सुख क्षी…
  9. Verses 18–19है ? इस आत्मदर्शन के उपाय को मैं अज्ञान की शान्ति के लिए अपने कुलगुरु हाने से कुल के ईश्व…