Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 25, Verses 9–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 25, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 9,10
संस्कृत श्लोक
पुनस्तान्येव तान्येव तत्रेहान्यत्र वापि च ।
इतश्चेतश्च वस्तूनि नापूर्वं नाम किंचन ॥ ९ ॥
सर्वमेव परित्यज्य परिहृत्य धिया स्वयम् ।
स्वस्थ एवावतिष्ठेऽहं पूर्णात्पूर्ण इवात्मनि ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
नया चमत्कार न दिखाई देने और चर्वितचर्वण रूप होने से भी ऐहिक ओर पारलौकिक भोगो मे
सार नहीं है, ऐसा कहते हैं।
स्वर्ग में, इस लोक में अथवा अन्य नागलोक आदि में पुनः-पुनः पूर्वानुभूत वे ही वस्तुएँ इधर उधर
स्थित हैं, कुछ भी नया नहीं हे । इसलिए सभी का परित्याग कर और बुद्धि से स्वयं परिहार कर प्राप्त हुए
स्वरूपबोध से पूर्ण की तरह स्थित मैं आत्मा में स्वस्थ होकर स्थित हूँ