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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 25, Verses 18–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 25, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

कोऽयं तावदहं किं स्यादात्मेत्यात्मावलोकनम् । पृच्छाम्यौशनसं नाथं नूनमज्ञानशान्तये ॥ १८ ॥ संचिन्तयामि परमेश्वरमाशु शुक्रमुद्यत्प्रसादमथ तेन गिरोपदिष्टे । तिष्ठाम्यनन्तविभवे स्वयमात्मनात्मन्यक्षीणमर्थमुपदेशगिरः फलन्ति ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

है ? इस आत्मदर्शन के उपाय को मैं अज्ञान की शान्ति के लिए अपने कुलगुरु हाने से कुल के ईश्वर शुक्राचार्यजी से पूछता हू । मेँ योगसिद्ध होने से सब अभिलाषाओं के अधिपति, आश्रित जनों पर सदा प्रसन्न रहने वाले शुक्राचार्यजी का चिन्तन करता हू । उनके द्वारा वाणी से उपदिष्ट अनन्त वैभवशाली आत्मा में स्वयं अपने से स्थित होऊँगा, क्योकि महात्माओं की उपदेशवाणियाँ अक्षय वस्तु को उत्पन्न करती हैं, कभी भी विफल नहीं होती