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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 25, Verses 3–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 25, verses 3–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 3-6

संस्कृत श्लोक

पुनरापूरयन्नाशां पुनरप्याहरन्धनम् । पुनरावर्जयन्कातां खिन्नोऽस्मि विभवस्थितौ ॥ ३ ॥ अहो नु खलु रम्येयं शमभूः शीतलान्तरा । सर्वा एव शमं यान्ति सुखदुःखदृशः शमे ॥ ४ ॥ शाम्यामि परिनिर्वामि सुखमासे शमे स्थितः । अयमन्तः प्रहृष्यामि चन्द्रबिम्ब इवार्पितः ॥ ५ ॥ उत्ताण्डवन्मनोरंहःप्रोषितोरुशरीरकम् । अनारतपरिक्षोभं हा दुःखं विभवार्जनम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

पुनः पुनः अपनी आशा को पूर्ण कर रहा, पुनः पुनः धन बटोर रहा एवं पुनः पुनः प्रिया को प्रार्थना आदि द्वारा अपने अनुकूल कर रहा मैं सम्पत्ति के परिपालन के विषय में संतृप्त हो गया हूँ। अहा, अत्यन्त शीतल यह शान्ति भूमि बड़ी रमणीय है। शान्तिगुण में सभी सुख-दुःख दृष्टियाँ नष्ट हो जाती हैं। शान्ति में स्थित मैं शान्ति को प्राप्त हो रहा हूँ, चन्द्रबिम्ब में रक्खे हुए की तरह मैँ सन्तापरहित हो रहा हूँ । सुखपूर्वक स्थित हूँ एवं मेरा अन्तःकरण अत्यन्त हर्षित हो रहा है। जिसमें भोगों की उत्कण्ठा से इधर-उधर तेजी से नाच रहे मन के वेग से विशाल शरीर जलाया जाता है और जिसमें निरन्तर क्षोभ भरा रहता है वह धनोपार्जन, दुःखरूप ही हे