Guru's AddaGuru's Adda

Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 21

बीसवाँ सर्ग समाप्त इक्कीसवों सर्म तृष्णारूपी पाश का क्षय ही मोक्ष है, आशा से चित्तवृत्तियाँ होती हैं, निराश और अपने से पूर्ण पुरुष की स्वतःमुक्ति होती है, यह वर्णन ।

12 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार उस पुण्य द्वारा प्रबोधित पावन जैसे प्…
  2. Verses 2–3ज्ञान ओर विज्ञान में पारंगत, सिद्ध ओर आनन्दित वे दोनों ही प्रारब्ध कर्मो का नाश होने तक उ…
  3. Verse 4पूर्वोक्त आख्यानका उपसंहार कर प्रस्तुत प्रसंग में उसकी योजना करते हैं। हे निष्पाप श्रीराम…
  4. Verses 5–6हे रघुनन्दन, इसलिए सब शोकों की मूलभूत, प्रत्येक विषय में अनन्त तृष्णाओं का एक-मात्र त्याग…
  5. Verse 7हे श्रीरामचन्द्रजी, उठिये ओर पूर्वोक्त ध्येय वासना त्यागरूपी रथ में बैठे हुए आप सब भूतो क…
  6. Verses 8–13हे महाबाहो, यह स्वच्छ, कामनारहित, निर्दोष ब्राह्मी स्थिति है, इसे प्राप्तकर व्यवहार मेँ अ…
  7. Verse 14यदि कोई शंका करे कि सन्ताप के कारणभूत आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक, रोग, वर्षा, धूप, चो…
  8. Verses 15–26चित्तरूपी ढूँठ के रहने पर बढने में रुकावट डालनेवाले कुवृक्ष के कट जाने के बाद उसके नीचे उ…
  9. Verse 27हे श्रीरामचन्द्रजी, चित्त में प्रविष्ट हुई उल्लू-पक्षीरूपी क्षुब्ध तृष्णा से भीतर में अमं…
  10. Verse 28यदि कोई शंका करे, एकमात्र आशा के त्याग से कैसे चित्त की शान्ति हो सकती है 2 संकल्प, सन्दे…
  11. Verse 29जाडा ओर उष्णता का नाश होने पर अग्नि के उपशम के समान वृत्ति का नाश होने परमन का उपशम सिद्ध…
  12. Verse 30पूर्वोक्त अर्थ का ही संग्रह करके उपसंहार करते है । हे महात्मन्‌, आप पुत्र, धन, लोक आदि की…