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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 21, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 21, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

चिन्तनं वृत्तिरित्युक्तं वर्तते चित्तमाशया । चित्तवृत्तिमतो ह्याशां त्यक्त्वा निश्चित्ततां व्रज ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे, एकमात्र आशा के त्याग से कैसे चित्त की शान्ति हो सकती है 2 संकल्प, सन्देह, धृति, अधृति आदि अन्य वृत्तियों से भी चित्त का पनपना नहीं येका जा सकता ? तो इस शंका का सब वृत्तियों की जड़ आशा ही है, यह दिखलाते हुए परिहार करते है। समाधि के समय बाह्य कारण रुके रहते हैं, अतएव चाक्षुष आदि वृत्तियाँ नहीं होती, इसलिए उस समय केवल चिन्तन ही चित्त की वृत्ति अवशिष्ट रहती हे । यह सिद्धान्त हम पहले कह आये हैं ओर चिन्तन में भी चित्त आशा से ही प्रवृत्त होता हे, क्योकि आशा आदि विषयों में ही पुरुषों का चिन्तन देखा जाता है, इसलिए आशानामक चित्तवृत्ति का त्यागकर आप निश्चितता को प्राप्त होइये