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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 21, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 21, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

चित्तकौशिकपक्षिण्या तृष्णया क्षुब्धयान्तरे । अमङ्गलानि विस्तारमलमायान्ति राघव ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, चित्त में प्रविष्ट हुई उल्लू-पक्षीरूपी क्षुब्ध तृष्णा से भीतर में अमंगल खूब विस्तार को प्राप्त होते हें । भाव यह कि जब कभी घर में उल्लू का प्रवेश होता है, तो मरण, दरिद्रता, आदि अनेक अमंगल होते हैं, ऐसा ज्योतिष आदि शास्त्रों में प्रसिद्ध हे । वह जब देह के अन्दर चित्त में निरन्तर प्रविष्ट होकर सब व्यवहारो मे क्षुब्ध होकर स्थित हो, तब उससे सभी अमंगल खूब विस्तार को प्राप्त होते हैं, इसमें कहना ही क्या है ?