Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 11
ढसवाँ सर्ग समाप्त ग्यारहवाँ सर्ग॑ आहिक कार्य को कर चुके राजा का रात्रि के अन्त में अनेकों विचित्र विवेकों से अपने चित्त का प्रबोधन ।
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- Verses 1–2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त रीति से विचार कर राजा जनक जैसे सूर्य…
- Verse 3देवता, ब्राह्मण आदि पूजनीय लोगों का पूजा, दान आदि द्वारा सम्मान कर उस दिन का कार्य पूरा क…
- Verses 4–8मन को, जिसका विषयभ्रम निवृत्त हो गया था, समाहित करके रात्रि व्यतीत होने पर उन्होने अपने च…
- Verses 9–11हे सुन्दर, इस चंचल संसारसृष्टि और शान्तिसुख को तराज् में रखकर अपनी बुद्धि से कौन सारभूत…
- Verse 12यदि कोई शंका करे कि दृश्य का सम्बन्ध रहते उससे होनेवाले वैषम्य का त्याग कैसे हो सकता है ?…
- Verse 13हे मन, तुम असत् हो और यह दृश्य भी सत् नहीं हे, इसलिए दोनों के ही वन्ध्यापुत्र ओर आकाशपु…
- Verse 14यदि कहते हो, मैं असत् नहीं हूँ। सत्य आत्मा ही मैं हूँ। दृश्य ही असत् है, तो भी दोनों का…
- Verses 15–17दोनों सत् ही हैं। कोई भी असत् नहीं है, इसमें भी कभी इष्ट का वियोग न होने से हर्ष तथा वि…
- Verse 18इस दृश्यवर्ग में जिसके प्राप्त होने से तुम परम परिपूर्णता को प्राप्त हो जाओ, ऐसी कोई भी उ…