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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 11, Verses 4–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 11, verses 4–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 4-8

संस्कृत श्लोक

मनः समरसं कृत्वा संशान्तविषयभ्रमम् । शर्वर्यां क्षीयमाणायामित्थं चित्तमबोधयत् ॥ ४ ॥ चित्त चञ्चल संसार आत्मनो न सुखाय ते । शममेहि शमाच्छान्तं सुखं सारमवाप्यते ॥ ५ ॥ यथा यथा विकल्पौघान्संकल्पयसि हेलया । तथा तथैति स्फारत्वं संसारस्तव चिन्तया ॥ ६ ॥ शतशाखत्वमायाति सेकेन विटपी यथा । अनन्ताधित्वमायासि शठभोगेच्छया तथा ॥ ७ ॥ चिन्ताजालविलासोत्था जन्मसंसारसृष्टयः । तस्मात्त्यक्त्वा विचित्रां त्वं चिन्तामुपशमं व्रज ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

मन को, जिसका विषयभ्रम निवृत्त हो गया था, समाहित करके रात्रि व्यतीत होने पर उन्होने अपने चित्त को इस प्रकार समझाया : हे चंचल चित्त, संसार तुम्हारे आत्मा के सुख के लिए नहीं है, तुम शान्ति को प्राप्त होओ । शान्ति से विक्षेपरहित सारभूत आत्मसुख प्राप्त होता है जैसे-जैसे तुम विविध विकल्पों का संकल्प करते हो वैसे-वैसे तुम्हारे चिन्तन से यह संसार अनायास वृद्धि को प्राप्त होता है । जैसे वृक्ष जल से सैकड़ों शाखावाला हो जाता है वैसे ही हे शठ, तुम भी भोग की इच्छा से असंख्य व्यथाओं से युक्त होते हो | चूँकि जन्म तथा संसार सृष्ट्या विषयचिन्ताओं के विकल्प से उदित हे, इसलिए तुम विविध चिन्ताओं का त्याग कर उपशम को प्राप्त होओ