Guru's AddaGuru's Adda

Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 24

तेईसर्वौँ सर्ग समाप्त चौबीसवाँ सर्म इन्द्रियों की प्रलता, उन पर विजय पाने के उपाय तथा उनसे प्रसाद और बोध द्वारा वासनाक्षय का वर्णन ।

20 verse-groups

  1. Verse 1इन्द्रियों की विजय मे उपाय और प्रयत्न की अधिकता बतलाने के लिए उनकी दुर्जयता कहते है । श्र…
  2. Verse 2जो कृतघ्न सर्वप्रथम अपने आश्रयभूत शरीर का नाश करते हैं, पापरूपी धनराशि से सम्पन्न वे स्वे…
  3. Verse 3अनिषिद्ध तथा निषिद्ध कर्मरूपी प्रचण्ड पंखों से युक्त, विषयरूपी मांस के लोभी इन्द्रियरूपी…
  4. Verse 4जैसे पाश (फन्दा) गजघटा का विनाश नहीं कर सकता वैसे ही जिस पुरुष ने विवेकरूपी सूत के जालसे…
  5. Verses 5–6उन शत्रुओं पर विजय पाने के लिए पहले विवेकरूपी धन का संचय करना चाहिए, इस आशय से कहते हैं।…
  6. Verse 7इन्द्रिय आदि के निग्रह काफल कहते हैं। जिसने इन्द्रियरूपी चाकरों को आक्रान्त कर लिया है तथ…
  7. Verse 8जिसके चित्त का अभिमान क्षीण हो गया है, जिसने इन्द्रियरूपी शत्रुओं को निगृहीत कर लिया है,…
  8. Verse 9अज्ञानान्धकार के वेतालरूपी ये वासनाएँ तभी तक पराक्रम दिखलाती हैं, जब तक परमात्मतत्त्व के…
  9. Verse 10स्वदेहरूपी नगरी के साम्राज्य मे चाकर, मन्त्री, सामन्तआदि के कार्य का शुद्ध मन ही सम्पादन…
  10. Verse 11मनीषी पुरुषो का मन ही लालन (उपसेवन) करने से स्नेहयुक्त ललना हे, पालन करने से पवित्र पिता…
  11. Verse 12मन के पिता होने में दूसरा हेतु भी कहते है। शास्त्र द्वारा दिखाई गई देवता की भावना से इनका…
  12. Verse 13भाग्यवश खान में देखी गई, सान की खराद से स्वच्छ की गई, प्रकाशक रस से प्रक्षालन द्वारा अच्छ…
  13. Verse 14मणि के साथ मन के रूपक प्रस्ताव के प्रस्तुत रहते ही मध्य मे श्रीरामचन््रजी की “मन्त्री सत्…
  14. Verse 15इस तरह रामचन्द्रजी का समाधान करके प्रस्तुत मणिरूपक कह उपसंहार करते है । इस तरह हे श्रीराम…
  15. Verse 16इस तरह विवेक को निरतिशय उत्तम फल देनेवाला बतलाकर अत्यन्त अनर्थ परिणामवाले विवेक- प्रमाद स…
  16. Verse 17सैकड़ों अनर्थो से व्याप्त, महामोहरूपी कुहरे से पूर्ण, उदित हुई इस संसार माया की महारोग की…
  17. Verse 18प्रस्तुत इन्द्रिय रूपी शत्रुओं के जयोपाय के उपदेश का उपसंहार करते हैँ । परम विवेक को प्रा…
  18. Verse 19यदि कोई कहे कि उत्पत्ति प्रकरण में तो इन्द्रियो की असत्यता बतलाई है। तो क्यो यहाँ उसकी जय…
  19. Verse 20तत्त्वदृष्टि से यद्यपि ये असत्य हैं, तथापि मोहद्रष्टि से उनकी सत्यता अनुभव सिद्ध है, इसलि…
  20. Verse 21हे महामते, यह दुश्यभूत देह आदि मैं हूँ, इस मिथ्या अभिमान को स्वतत्त्वनिश्चय के द्वारा अच्…