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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 76

पचहत्तरवाँ सर्ग समाप्त छिहत्तरवाँ सर्ग देह को प्राप्त करके समाधि में बैठी हुई छः महीने में क्षुधित होकर समाधि से उठी हुई कर्कटी का वायु के वचन से किरातों के देश में जाना।

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  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, सम्पूर्णं अवयवों के प्रादुर्भूत होने के बाद यह कर्क…
  2. Verse 2बद्धमूल बृहद्राक्षसभाव को केचुल के समान छोड दिया यानी जैसे साँप केंचुल छोड़ता है वैसे ही…
  3. Verse 3निष्प्रपंच आत्मा का अपनी वृत्तिधारा द्वारा आश्रय लेकर बद्धपद्मासन से स्थिर और आत्मध्यान म…
  4. Verse 4तदनन्तर छः महीने में जैसे वर्षाकाल में बड़े भारी मेघ के निर्घोष से मयूरी बोध को (कामोद्बो…
  5. Verse 5समाधि से जागी हुई वह बहिर्वृत्ति होकर क्षुधा से पीड़ित रही, जब तक देह रहती है, तब तक देह…
  6. Verses 6–7तदनन्तर चिन्तन हेतु मन से उसने विचार किया कि मैं किसे निगलूँ ? मुझे अन्याय के साथ दूसरे ज…
  7. Verses 8–9यदि न्यायोपार्जित भोजन के बिना इस शरीर का मैं परित्याग कर दूँ, तो कोई अन्याय नहीं होगा, क…
  8. Verse 10मैं देह आदि भ्रम जिसका भूषण है, ऐसी मनोमात्र थी, वह भ्रम (मनोमात्रत्व) मेरा शान्त हो गया,…
  9. Verse 11श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, मौन होकर बैठी हुई उसने राक्षसस्वभाव का परित्याग करने से…
  10. Verses 12–13हे कर्कटी, तुम मूढ (अज्ञानी) लोगों के पास जाओ ओर ज्ञान से उन्हें शीघ्र उद्बुद्ध करो, अज्ञ…
  11. Verses 14–15वायु के वचन को सुनकर “आपने मेरे ऊपर अनुग्रह किया ।* - यह कहकर वह धीरे से उठी ओर पर्वतशिखर…
  12. Verse 16उसमें अन्न, पशु, जन-समुह, धन, हरे तृण, ओषध ओर मांस प्रचुर मात्रा में था, असंख्य कन्दमूल,…
  13. Verse 17तदनन्तर रात्रि में, जब कि अत्यन्त निविड अन्धकार से मार्ग-भूमि व्याप्त थी, जले हुए ओर काजल…