Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 36
पैंतीसवाँ सर्ग समाप्त छत्तीसवाँ सर्ग समान अस्त्र-शस्त्रों से द्वन्द्रयुद्ध और पूर्व आदि देशों के साथ उन देशों के अधिपतिरूप सहायकों का वर्णन ।
22 verse-groups
- Verses 1–4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, मेघपंक्तियाँ जिनमें विश्राम ले रही थी ऐसे हाथ…
- Verse 5जैसे पंजर पंजर के साथ मिलता है, हाथियों का झुण्ड हाथियों के झुण्ड के साथ बड़े वेग से मिलत…
- Verse 6जैसे सागर में तरंगों के समूह से तरंगों का समूह शब्दपूर्वक मिलता है वैसे ही उस युद्ध में घ…
- Verse 7जैसे वायु से चंचल बाँसों का समूह वायु से हिलनेवाले बाँसों के समूह के साथ लड़ता है वैसे ही…
- Verse 8जैसे उड़ा हुआ असुरनगर देवनगर से अपने अंग-प्रत्यंगों को चूरचूर करे, वैसे ही रथों के समूह न…
- Verse 9जिसने बाणों से आकाश पाट दिया है ऐसे धनुर्धरों की सेना से सरसराते हुए असंख्य बाणों की मूसल…
- Verse 10जब उन विषमायुधवाले युद्धों में युद्धरूपी प्रलयाग्नि भड़की तब भयभीत चित्तवाले योद्धा लोग क…
- Verses 11–17से, कुल्हाड़ों के वार में प्रसिद्धि प्राप्त योद्धाओं ने कुल्हाड़ाधारी योद्धाओं से, दण्डधा…
- Verse 18वह युद्धाकाशरूपी एकमात्रसागर अति सुशोभित हुआ । उसमें वार करने के लिए व्याकुल चक्रों की रा…
- Verse 19पृथिवी और अन्तरिक्ष का मध्यभाग रूपी वह सागर अमर (जीवित) लोगों से दुस्तर हुआ, उसमें चमचमा…
- Verses 20–21आयुध विद्या, बुद्धि, बल, शूरता, अस्त्रशस्त्र, घोड़े, रथ ओर धनुष ये आठ जिनके अप्रतिहत हैं,…
- Verses 22–29अब विदूरथ और सिन्धुराज के सहायक लोगों का पूर्व आदि दिशाओं के भेद से क्रमशः वर्णन करने की…
- Verses 30–39हे रामजी, दक्षिण दिशा में लीला के पति के सहायक वीर नरपतियों का मैं उल्लेख करता हूँ, सुनो…
- Verses 40–43पश्चिम ओर दक्षिण दिशा के मध्य में महाराज्य, सुराष्ट्र, किन्थुस सौवीरस शूद्र, आभीर, द्रविड…
- Verses 44–45अब हे श्रीरामचन्द्रजी, लीला के पति के विपक्ष में स्थित वीरो ओर उनके देशों को मैं आपसे कहत…
- Verses 46–48हे श्रीरामचन्द्रजी, काश तथा ब्राह्मण के समूहो के अन्तक पंचननामकजल और भारक्षतथ, पारक, शान्…
- Verse 49हे श्रीरामचन्द्रजी, उसके अनन्तर दो सौ योजन तक पृथिवी जनपदों से शून्य है, और उसके अनन्तर म…
- Verse 50सैकड़ों पर्वतां से युक्त आश्वनामक पर्वत है, उसके अनन्तर भयंकर महासमुद्र है, जिसके तट पर प…
- Verse 51पश्चिम ओर उत्तर दिशा के अन्तराल भाग में, जो पर्वतप्राय है, वेणुपति ओर नरपति देश है, जहाँ…
- Verses 52–54दिशा में हिमवान, क्रौंच ओर मधुमान् नाम पर्वत हैँ
- Verse 55इनके अनन्तर कैलास, वसुमान् और मेरुपर्वत हैं, उनके सहायक पर्वत श्रेणियों में ये मनुष्य रह…
- Verses 56–67इसके अनन्तर ये क्षत्रिय और देश हैं, राजन्य, अर्जुनातनय, त्रिगर्त, एकवाद, क्षुद्र, आमबल और…