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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 36, Verses 56–67

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 36, verses 56–67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 56-67

संस्कृत श्लोक

राजन्याश्च तथा ज्ञेया अर्जुनातनयस्तथा । त्रिगर्त एकपात्क्षुद्रामबलास्वस्तवासिनः ॥ ५६ ॥ अबलाः प्रखलाः शाकाः क्षेमधूर्तय एव च । दशधानागावसन्यदण्डाहन्यसनास्तथा ॥ ५७ ॥ धानदाः सरकाश्चैव वाटधानास्तथैव च । अन्तरद्वीपगान्धारास्तथावन्तिसुरास्तथा ॥ ५८ ॥ अथ तक्षशिला नाम ततो वीलवगोधनी । पुष्करावर्तदेशस्य यशोवतिमही ततः ॥ ५९ ॥ ततो नाभिमतिर्भूमिस्तिक्षा कालवरास्तथा । काहकं नगरं चैव सुरभूतिपुरं तथा ॥ ६० ॥ तथैव रतिकादर्शा अन्तरादर्श एव च । ततः पिङ्गलपाण्डव्यं यामुने यातुधानकाः ॥ ६१ ॥ मानवा नांगना हेमतालाः स्वस्वमुखास्तथा । हिमवान्वसुमान्क्रौञ्चकैलासावित्यगास्तथा ॥ ६२ ॥ ततोऽजनपदा भूमिरशीतिशतयोजना । अथ प्रागुत्तरस्यां तु क्रमाज्जनपदाञ्छृणु ॥ ६३ ॥ कालुता ब्रह्मपुत्राश्च कुणिदाः खदिनास्तथा । मालवा रन्ध्रराज्याश्च वना राष्ट्रास्तथैव च ॥ ६४ ॥ केडवस्ताः सिंहपुत्रास्तथा वामनतां गताः । सावाकच्चापलवहाः कामिरा दरदास्तथा ॥ ६५ ॥ अभिसासदजार्वाकाः पलोलकुविकौतुकाः । किरातायामुपाताश्च दीनाः स्वर्णमही ततः ॥ ६६ ॥ देवस्थलोपवनभूस्तदनूदितश्रीर्विश्वावसोस्तदनु मन्दिरमुत्तमं च । कैलासभूस्तदनु मञ्जुवनश्च शैलो विद्याधरामरविमानसमानभूमिः ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

इसके अनन्तर ये क्षत्रिय और देश हैं, राजन्य, अर्जुनातनय, त्रिगर्त, एकवाद, क्षुद्र, आमबल और अस्ताचलवासी, अबल, ब्रखल, शाक, क्षेम, धूर्ति, दश प्रकार के नाग, अवसनी, अदण्ड, अहन्यसह, धानद, सरक, वाटधान, अनन्तर द्वीप के निवासी, गान्धारस वन्ति ओर सुर, इसके अनन्तर दक्षशिला, बीलव, गोधनी, इसके अनन्तर पुष्करावर्तं देश की यशोवती नाम की पृथिवी है । इसके अनन्तर नाभिमती भूमि है ओर उसके वाद तिक्षा तथा कालवराभूमि है ओर काहक तथा सुरभूतिपुर नामक नगर हैं, तदनन्तर रतिकादर्श, अन्तरादर्श पिंगल एवं पाण्डव्य के निवासी जन और यमुना के तीरवासी यातुधानक, नांगन, हेमताल, स्वसुख तथा हिमालय, वसुमान्‌, क्रौंच और केलास ये पर्वत हैं। तदुपरान्त देशरहित अस्सी योजन विस्तृत भूमि हे । तदनन्तर पूर्व ओर उत्तर दिशा के अन्तराल के क्रमशः इन देशों को सूनिये कालूत, ब्रह्मपुत्र, कुणिद, खादिन, मालव, रन्ध्रराज्य, वन, राष्ट्र, केडवस्त, सिंहपुत्र, वामन सावाकत्‌, जापलवह, कामिर, दरद, अभिसासद, जार्वाक, पलोल, कुवि, कौतुक, किरात, यामुपात, दील तदुपरान्त स्वर्ण भूमि है, तदनन्तर अतिसुशोभित देवस्थल भूमि है, उसके बाद गन्धर्वराज विश्वावसु का उत्तम मन्दिर हे, तदनन्तर केलासभूमि है, तदनन्तर मंचुवन नामका पर्वत है, तदनन्तर विद्याधर ओर देवगणो की विमान के सदुश अभिराम भूमि हे