Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 117
एक सौ सोलहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सत्रहवाँ सर्गं ज्ञानभूमि के भेदं के उपोद्घातरूप से सात प्रकार की अज्ञानभूमिका का प्रसंगतः वर्णन ।
13 verse-groups
- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, सिद्धि देनेवाली सात योगभूमिकाएँ कैसी हैं, हे सर्वतत्त्वव…
- Verses 2–3हास और वृद्धि देखी जाती है एवं उन-उन कारणों से ये सब भूमिकाएँ अपने-अपने विषय से बद्धमूल ह…
- Verse 4उनमें से पहले आप सात प्रकार की अज्ञानभूमिका को सुनिये । तदनन्तर आप सात प्रकार की ज्ञानभूम…
- Verse 5पहले दोनों भूमिकाओं में से प्रत्येक का फलतः साधारण लक्षण कहते हैं। स्वरूप में स्थिति मुक्…
- Verse 6उसमें पहले का लक्षण स्पष्ट करते हैं। जो राग-द्वेष का उदय न होने से शुद्ध सन्मात्र ज्ञानरू…
- Verse 7जो स्वरुप से भ्रष्ट होने के कारण चेत्य अर्थ में (विषय में) चिति का मग्न होना है, इससे बढ़…
- Verses 8–9चित्त के एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में जाने पर यानी पूर्व विषय से हटकर अन्य विषय में जाने…
- Verses 10–14अन्दर अहन्तांश के और बाहर भेद के विनष्ट ओर शान्त होने पर तथा दोनों जगह निस्पन्द होने पर स…
- Verses 15–20यह ज्ञान की नूतन अवस्था हे । अब आप जाग्रत संसार को सुनिये । नवप्रसूत बीजजाग्रत के बाद “अय…
- Verses 21–24ये तृण, ठेले, शिला आदि सब पदार्थ उस अवस्था में भी परमाणु के प्रमाण से रहते हैँ । उपसंहार…
- Verses 25–27उनमें एक एक के अन्दर दूसरी-दूसरी का आविर्भाव होने से परस्परसंमिश्रण से अनन्त भेद होते हैं…
- Verse 28कोई सृष्टियाँ दीर्घकाल तक स्वप्न- जाग्रत् रूपसे स्थित हैं, कोई सृष्टियाँ स्वप्न जाग्रत्…
- Verse 29यों वर्णित अज्ञानभूमिका का उपसंहार कर रहे श्रीवसिष्ठजी उससे उतरने का उपाय कहते हैं। इस प्…