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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 117, Verses 21–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 117, verses 21–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 117 · श्लोक 21-24

संस्कृत श्लोक

चिरसंदर्शनाभावादप्रफुल्लवृहद्वपुः । स्वप्नो जाग्रत्तया रूढो महाजाग्रत्पदं गतः ॥ २१ ॥ अक्षतेवाक्षते देहे स्वप्नजाग्रन्मतं हि तत् । षडवस्थापरित्यागे जडा जीवस्य या स्थितिः ॥ २२ ॥ भविष्यद्दुःखबोधाढ्या सौषुप्ती सोच्यते गतिः । एते तस्यामवस्थायां तृणलोष्टशिलादयः ॥ २३ ॥ पदार्थाः संस्थिताः सर्वे परमाणुप्रमाणिनः । सप्तावस्था इति प्रोक्ता मयाऽज्ञानस्य राघव ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

ये तृण, ठेले, शिला आदि सब पदार्थ उस अवस्था में भी परमाणु के प्रमाण से रहते हैँ । उपसंहार करते हैं । हे श्रीरामचन्द्रजी, मैंने आपसे अज्ञान की ये सात अवस्थाएँ कहीं हैं