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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 117, Verses 25–27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 117, verses 25–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 117 · श्लोक 25-27

संस्कृत श्लोक

एकैका शतशाखात्र नानाविभवरूपिणी । जाग्रत्स्वप्नश्चिरं रूढो जागृतावेव गच्छति ॥ २५ ॥ नानापदार्थभेदेन सविकासं विजृम्भते । अस्यामप्युदरे सन्ति महाजाग्रद्दशादृशः ॥ २६ ॥ तासामप्यन्तरे लोको मोहान्मोहान्तरं व्रजेत् । अन्तःपातिजलावर्त इव धावति नौर्भ्रमम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

उनमें एक एक के अन्दर दूसरी-दूसरी का आविर्भाव होने से परस्परसंमिश्रण से अनन्त भेद होते हैं, ऐसा कहतें हैं । इनमें नाना विभववाली एक एक की सैंकड़ों शाखाएँ हैं चिरकाल तक बद्धमूल हुई जाग्रत्स्वप्नावस्था जाग्रदवस्था में ही मिलती है । उक्त अवस्था नाना पदार्थो के भेद से खूब विकास के साथ वृद्धि को प्राप्त होती है । इस जाग्रदवस्था को प्राप्त हुई जाग्रत्स्वप्न अवस्था के भी अन्दर महाजाग्रत्‌दशारूप प्रतीतियाँ पृथक्‌-पृथक्‌ हें । उनके भी अन्दर जैसे नदी के भीतर गिरनेवाले जलभँवर में नौका भ्रमण को प्राप्त होती है यानी चक्कर काटती है, वैसे ही जीव एक मोह से दूसरे मोह को प्राप्त होते हैं