Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 117, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 117, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 117 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
शुद्धसन्मात्रसंवित्तेः स्वरूपान्न चलन्ति ये ।
रागद्वेषोदयाभावात्तेषां नाज्ञत्वसंभवः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें पहले का लक्षण स्पष्ट करते हैं।
जो राग-द्वेष का उदय न होने से शुद्ध सन्मात्र ज्ञानरूप से विचलित नहीं होते हैं, उनमें
अज्ञता की संभावना नहीं हैं