Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 109
एक सौ आठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ नवां सर्ग दुर्भिक्ष पीडित विन्ध्यप्रदेश से स्त्रीसहित निकले हुए पुत्र की आपत्ति देखकर अग्नि में प्रवेश करने के लिए इच्छुक राजा का जागकर सदस्यों से संवाद ।
17 verse-groups
- Verses 1–2राजा ने कहा : हे सभासदां, उस समय उक्त कष्टदायिनी दैव की प्रतिकूलता के, जो अत्यन्त सन्ताप…
- Verse 3जैसे वन में काटे गये वृक्ष वहीं पर जीर्णशीर्ण हो जाते हैं वैसे ही कितने लोग, जो अपने पुत्…
- Verse 4जैसे अपने घोंसले से निकले हुए पक्षियों को, जिनके पंख नहीं निकले हों, बाज खा जाते हैं, वैस…
- Verse 5पतंगों की नाई कोई लोग जली हुई आग में प्रविष्ट हो गये, कोई पहाड़ से लुढकी हुई शिलाओं की भा…
- Verse 6मैं तो उन श्वसुर आदि मित्रों को छोड़कर मेरे पीछे चल सकने में समर्थ केवल अपने कुटुम्ब को ल…
- Verse 7अग्नि, वायु, बाघ आदि हिंसक जीवों और सर्प आदि की आँखों में धूल झोंककर यानी उनसे बचकर मैं म…
- Verses 8–13उस देश की सीमा में पहुँचकर वहाँ एक ताड के पेड़ के तले अपने कन्धे से बच्चों को, जो विविध अ…
- Verse 14मैंने उससे बार-बार कहा : बेटा, मांस नहीं है । फिर भी वह मन्दमति मुझे मांस दीजिये कहता ही…
- Verses 15–16तदुपरान्त पुत्र के प्रति गहरे स्नेह से मूढ बने हुए अतएव अत्यन्त दुःखी मैंने उससे कहा : बे…
- Verses 17–18स्नेह और करुणा से मोह में पड़े हुए तथा अत्यन्त दुःखित हुए मैंने, जो कि उस तीव्र आपत्ति को…
- Verses 19–24वहाँ पर लकड़ियों को इकड़ी कर मैंने चिता बनाई । वह चिता चटचट शब्दों से मेरी अभिलाषा करनेवा…
- Verse 25विलासरूपी मन ही जगत् हे
- Verse 26सर्वशक्तिशाली विधाता की सैंकड़ों विचित्र शक्तियाँ हैँ, जिनसे विवेकशील मन को भी वे मन से म…
- Verse 27जिन्हें लोक का वृत्तान्त भलीभाँति ज्ञात है, ऐसे ये महीपति कहाँ ओर पामर लोगों की मनोवृत्ति…
- Verses 28–29एेन्द्रजालिक की इच्छा नहीं हे । यह मनमें मोह डालनेवाली माया है । एेन्द्रजालिक तो नित्य धन…
- Verse 30यह आख्यायिका न तो बालकाख्यायिका के समान कल्पित कथा है ओर न दूसरे के मुँह से सुनी है, बल्क…
- Verse 31हे महात्मन् इस प्रकार बहुत- सी कल्पनाओं से बद्धमूल (जिसने अपने कलेवर की वृद्धि की है) अत…