Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 109, Verses 19–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 109, verses 19–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 109 · श्लोक 19-24
संस्कृत श्लोक
तत्र काष्ठानि संचित्य चितां रचितवानहम् ।
चिता चटचटास्फोटैः स्थिता मदभिकाङ्क्षिणी ॥ १९ ॥
तस्यां तु यावदात्मानं चितायां निक्षिपाम्यहम् ।
चलितोऽस्मि जवात्तावदस्मात्सिंहासनान्नृपः ॥ २० ॥
ततस्तूर्यनिनादेन जयशब्देन बोधितः ।
इति शाम्बरिकेणायं मोह उत्पादितो मम ॥ २१ ॥
अज्ञानेनेव जीवस्य दशाशतसमन्वितः ।
इत्युक्तवति राजेन्द्रे लवणे भूरितेजसि ॥ २२ ॥
अन्तर्धानं जगामाशु तत्र शाम्बरिकः क्षणात् ।
अथेदमूचुस्ते सभ्या विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ॥ २३ ॥
नायं शाम्बरिको देव यस्य नास्ति धनैषणा ।
दैवी काचन मायेयं संसारस्थितिबोधिनी ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर लकड़ियों
को इकड़ी कर मैंने चिता बनाई । वह चिता चटचट शब्दों से मेरी अभिलाषा करनेवाली-सी
स्थित हुई । उस चिता में जैसे ही मैं अपने को फेंकने लगा वैसे ही इस सिंहासन से राजा
रूप मैं बड़े वेग से चलित हुआ | तदनन्तर तुरी के शब्द से और जय घोष से मैं जगाया गया ।
इस प्रकार एेन्द्रजालिक ने जैसे अज्ञान जीव की सैंकड़ों दशाओं से युक्त मोह उत्पन्न करता
है वैसे ही यह मोह मुझमें उत्पन्न किया । अत्यन्त तेजस्वी राजाधिराज लवण के यह कह
चुकने पर ऐन्द्रजालिक एक क्षण में वहीं पर अन्तर्हित हो गया । आश्चर्य से आँखें तरेरते हुए
सदस्यों ने राजा से कहा : राजन्, जिसको धन की इच्छा नहीं हैं, वह ऐन्द्रजालिक नहीं हो
सकता । यह संसार की स्थिति समझानेवाली कोई दैवी माया है