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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 109, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 109, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 109 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

राजोवाच । तस्मिंस्तदा वर्तमाने कष्टे विधिविपर्यये । अकालोल्वणकल्पान्ते नितान्तं तापदायिनि ॥ १ ॥ जनाः केचन निष्क्रम्य सकलत्रसुहृज्जनाः । गता देशान्तरं व्योम्नः शरदीव पयोधराः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा ने कहा : हे सभासदां, उस समय उक्त कष्टदायिनी दैव की प्रतिकूलता के, जो अत्यन्त सन्ताप देनेवाली थी, अतएव यदि उसे अकाल में प्राप्त घोर प्रलय कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी, सिर पर पड़ने पर जैसे शरद्‌ ऋतुमें आकाश से मेघ कहीं दूसरे प्रदेश में चले जाते हैं वैसे ही कोई लोग अपने परिवार बन्धु- बान्धवं के साथ निकल कर दूसरे देश में चले गये

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ आठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ नवां सर्ग दुर्भिक्ष पीडित विन्ध्यप्रदेश से स्त्रीसहित निकले हुए पुत्र की आपत्ति देखकर अग्नि में प्रवेश करने के लिए इच्छुक राजा का जागकर सदस्यों से संवाद ।