Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 6
पौँवर्वौ सर्ग समाप्त छठा सर्म जहाँ प्रयत्न करने पर भी कार्य विनाश होने पर प्रबल दैव कार्य विनाशक माना जाता है, वहाँ पर विघातक अन्य पुरुष का प्रयत्न ही "दैव“ शब्द से कहा जाता है अथवा अपना प्राक्तन बलवान् पौरुष ही दैव कहा जाता है ।
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- Verses 1–6श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्र पौरुष से अतिरिक्त देव कोई वस्तु नहीं हे, इसलिए पूर्वज…
- Verse 7जहाँ कहीं दैव की प्रबलता प्रसिद्ध है, वहाँ पर भी पौरुष की ही प्रबलता है, यह कहते हैं। यदि…
- Verses 8–16पुरुष के अधीन जो विषय हैं, उन्हीं में ऐसा हो सकता है, जो पुरूष के अधीन नहीं है, वे तो दैव…
- Verses 17–18अन्य के पौरुष से अन्य को फल की प्राप्ति होने पर व्यभिचार की आशंका कर कहते है । अथवा, जहाँ…
- Verse 19दोनों (ऐहिक ओर प्राक्तन) पौरुषो में से एेहिक पौरुष ही प्रत्यक्षतः बलवान् है, इसलिए जिस प…
- Verses 20–23ओले आदि गिरने से खेती के विनाश आदि में इससे विपरीत ही (पौरुष से दैव ही प्रबल) देखा जाता ह…
- Verses 24–29जिस देश में जिस काल में प्रयत्न विफल हो जाय, उसका त्याग कर दूसरे देश में, दूसरे काल में,…
- Verses 30–39(शंका - एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेम्यो लोकेभ्य उन्निनीषते“ (यही उस पुरुष से अच्छे क…
- Verses 40–43समर्थित जो चित्तशुद्धिरूप और ज्ञानरूप अति प्रसिद्ध फल है, उसकी हृदय में अति उत्कट अभिलाषा…