Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 6, Verses 1–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 6, verses 1–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 1-6
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
तस्मात्प्राक्पौरुषाद्दैवं नान्यत्तत्प्रोज्झ्य दूरतः ।
साधुसंगमसच्छास्त्रैर्जीवमुत्तारयेद्बलात् ॥ १ ॥
यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा ।
इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च ॥ २ ॥
दुःखाद्यथा दुःखकाले हा कष्टमिति कथ्यते ।
हाकष्टशब्दपर्यायस्तथा हा दैवमित्यपि ॥ ३ ॥
प्राक्स्वकर्मेतराकारं दैवं नाम न विद्यते ।
बालः प्रबलपुंसेव तज्जेतुमिह शक्यते ॥ ४ ॥
ह्यस्तनो दुष्ट आचार आचारेणाद्य चारुणा ।
यथाशु शुभतामेति प्राक्तनं कर्म तत्तथा ॥ ५ ॥
तज्जयाय यतन्ते ये न लोभलवलम्पटाः ।
ते दीनाः प्राकृता मूढाः स्थिता दैवपरायणाः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्र पौरुष से अतिरिक्त देव कोई वस्तु नहीं हे, इसलिए
पूर्वजन्म में किया गया पुरुषप्रयत्न ही देव हे । अतएव मैं देव के आधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ,
ऐसी बुद्धि का सज्जन संगति एवं सत्शास्त्र के अभ्यास से सर्वथा परित्याग कर अधिकारी
मनुष्य को इस संसारसागर से अपना उद्धार करना चाहिए । जैसा जैसा प्रयत्न होगा वैसा वैसा
शीघ्र फल होगा, इसीका नाम पौरुष है और उसीको दैव भी कहते हे, दैव ओर पौरुष में कोई
अन्तर नहीं हे । जैसे दुःख के समय में दुःख से “हा कष्ट” कहा जाता है, वैसे ही “हा कष्ट" शब्द
का ही दूसरा पर्याय हा दैव" भी है अर्थात् दुःखरूप से परिणत अपना प्राक्तन कर्म “हा कष्ट
शब्द से कहा जाता है और वही "देव" है । देव अपने प्राक्तन कर्म से भिन्न नहीं हे । जैसे प्रबल
पुरुष बालक को जीत लेता है, वैसे ही वह भी प्रबल पौरुष से जीता जा सकता हे । जैसे कल
का दुराचरण आज के सुन्दर सदाचरण से शुभता को प्राप्त होता है, वैसे ही प्राक्तन अशुभ
कर्म की अशुभता वर्तमान शुभ कर्म से नष्ट हो जाती है । जो लोग तुच्छ विषयसुख के लोभ में
पड़कर प्राक्तन कर्मरूपी दैव को जीतने के लिए प्रयत्न नहीं करते तथा सदा दैव के भरोसे बैठे
2 इसकी व्याख्या यों भी है वाल्मीकिजी ने कहा, यह अरिष्टनेमि के प्रति देवदूत की उक्ति
है, वाल्मीकिजी के उक्त प्रकार से भरद्राज के प्रति कहने पर दिन अस्त हो गया, सूर्य भगवान्
अस्ताचल के शिखर चले गये एवं मुनियों की सभा वाल्मीकिजी को नमस्कार कर सायंकालीन
सन्ध्योपासना, अग्निहोत्र आदि करने के लिए स्नानार्थ चली गई और रात्रि के बीतने के अनन्तर
सूर्योदय होनेपर पुनःवाल्मीकिजी के पास आ गई । टीकाकार का कहना है कि यदि इस प्रकार अर्थ
न किया जायेगा तो आगे तत्-तत् स्थलों में जो दशरथ सभा के उत्थान का वर्णन, आदिक
कममनुष्ठान वर्णन, रात्रि में राम आदि के साथ श्रुत अर्थ के चिन्तन का वर्णन, एवं प्रातः सूर्योदय
आदि का वर्णन किया गया है, वह असंगत हो जायेगा ।
रहते हैं, वे बेचारे पामर और मूर्ख हैं
सर्ग सन्दर्भ
पौँवर्वौ सर्ग समाप्त छठा सर्म जहाँ प्रयत्न करने पर भी कार्य विनाश होने पर प्रबल दैव कार्य विनाशक माना जाता है, वहाँ पर विघातक अन्य पुरुष का प्रयत्न ही "दैव“ शब्द से कहा जाता है अथवा अपना प्राक्तन बलवान् पौरुष ही दैव कहा जाता है ।