Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 6, Verses 17–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 6, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 17, 18
संस्कृत श्लोक
भिक्षुको मङ्गलेभेन नृपो यत्क्रियते क्वचित् ।
प्राक्तनं पौरुषं तत्र बलवद्वापि कारणम् ॥ १७ ॥
ऐहिकः प्राक्तनं हन्ति प्राक्तनोऽद्यतनं बलात् ।
सर्वदा पुरुषस्पन्दस्तत्रानुद्वेगवाञ्जयी ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्य के पौरुष से अन्य को फल की प्राप्ति होने पर व्यभिचार की आशंका कर कहते है ।
अथवा, जहाँ कहीं अलंकृत हाथी से भिक्षुक राजा बनाया जाता है, वहाँ पर भिक्षुक का
पूर्वजन्म का प्रबल पौरुष भी कारण हे । इस जन्म में किया गया प्रबल पुरुषप्रयत्न अपने बल से
पूर्वजन्म के पौरुष को नष्ट कर देता है और पूर्वजन्मका प्रबल पौरुष इस जन्म के पौरुष को
अपने बल से नष्ट कर देता हे । वही पौरुष सदा विजयी होता है, जो उद्वेग से रहित हे । इसी
जन्म का ही पौरुष उद्रेगशून्य हो सकता हे, पूर्वजन्म का नहीं; क्योंकि वह पहले ही विच्छिन्न
हो चुका हे, यह भाव है