Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 6, Verses 30–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 6, verses 30–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 30-39
संस्कृत श्लोक
व्यवहारसहस्राणि यान्युपायान्ति यान्ति च ।
यथाशास्त्रं विहर्तव्यं तेषु त्यक्त्वा सुखासुखे ॥ ३० ॥
यथाशास्त्रमनुच्छिन्नां मर्यादां स्वामनुज्झतः ।
उपतिष्ठन्ति सर्वाणि रत्नान्यम्बुनिधाविव ॥ ३१ ॥
स्वार्थप्रापककार्यैकप्रयत्नपरता बुधैः ।
प्रोक्ता पौरुषशब्देन सा सिद्ध्यै शास्त्रयन्त्रिता ॥ ३२ ॥
क्रियया स्पन्दधर्मिण्या स्वार्थसाधकता स्वयम् ।
साधुसंगमसच्छास्त्रतीक्ष्णयोन्नीयते धिया ॥ ३३ ॥
अनन्तं समतानन्दं परमार्थं विदुर्बुधाः ।
स येभ्यः प्राप्यते नित्यं ते सेव्याः शास्त्रसाधवः ॥ ३४ ॥
देवलोकादिहागत्य लोकद्वयहितं भवेत् ।
प्राक्तनं पौरुषं तद्वै दैवशब्देन कथ्यते ॥ ३५ ॥
तद्युक्तमेतदेतस्मिन्नास्ति नापवदामहे ।
मूढैः प्रकल्पितं दैवं मन्यन्ते ये क्षयं गताः ॥ ३६ ॥
नित्यं स्वपौरुषादेव लोकद्वयहितं भवेत् ।
ह्यस्तनी दुष्क्रियाभ्येति शोभां सत्क्रियया यथा ॥ ३७ ॥
अद्यैवं प्राक्तनी तस्माद्यत्नाद्यः कार्यवान्भवेत् ।
करामलकवद्दृष्टं पौरुषादेव तत्फलम् ।
मूढः प्रत्यक्षमुत्सृज्य दैवमोहे निमज्जति ॥ ३८ ॥
सकलकारणकार्यविवर्जितं निजविकल्पबलादुपकल्पितम् ।
तदनपेक्ष्य हि दैवमसन्मयं श्रय शुभाशय पौरुषमात्मनः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
(शंका - एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेम्यो लोकेभ्य उन्निनीषते“ (यही उस पुरुष से
अच्छे कर्म करवाता है, जिसका इस लोक से उद्धार करने की इच्छा करता है) “य आत्मनि
तिष्ठन् आत्मनमन्तरो यमयति” (जो अन्तर्यामी आत्मा में स्थित होकर आत्मा का नियन्त्रण
करता है), इश्वरः सर्वभूताना हदेशेऽर्जुन तिष्ठति” (हे अर्जुन, ईश्वर सव प्राणियों के हृदय में
स्थित है) इत्यादि श्रुति ओर स्मृतियों से विरुद्ध इश्वर का अपलाप कर जीव की स्वतन्त्रता
कैसे कहते हैं ?
समाधान - आप भी “यथाकारी यथाचारी तथा भवति तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति
पापकारी पापो भवति (जैसा करता है वैसा होता है, साधुकर्मकारी साधु होता है और
पापकर्मकारी पापी होता है), यजेत् जुहुयाद् दद्यात्“ (यज्ञ करें, हवन करें, दान दें) कर्ता
शात्त्रार्थवत््वात्” (आत्मा कर्ता है, क्योकि कर्ता को अपेक्षित उपायों का बोध करानेवाला
विधिशास्त्र निरर्थक हो जायेगा), “न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सजति प्रभुः“ (ईश्वर जीवों
के न कर्त्व की सृष्टि करते हैं और न कर्मो की सृष्टि करते है) इत्यादि श्रुति और स्मृति से
विरुद्ध जीवकी परतन्त्रता का प्रतिपादन कैसे करते हैं 2 अस्वतन्त्र जीव कर्ता नहीं हो सकता,
क्योकि यदि अस्वतन्त्र को कर्ता मानेंगे, तो “स्वतन्त्रः कर्ता इस शास्त्र से विरोध होगा ।
बलवान् इश्वर की अधीनता में स्थित पुरुष सैकड़ों विधियों और हजारों निषेधो से न तो किसी
कर्म में प्रवृत्त किया जा सकता है ओर न निवृत्त किया जा सकता है । दूसरी बात यह भी है कि
इश्वर द्वारा जबरदस्ती ब्रह्महत्या आदि दुष्कर्म में प्रवृत्त कराया गया जीव कैसे अपराधी होगा
और स्वयं ही लोगों को बुरे कर्मो में प्रवृत्त कराकर उन्हें नरकर्मे गिरा रहे भगवान् वैषम्य ओर
नैरण्य दोष के भागी क्यो न होंगे ? और अन्तयमिी ब्राह्मण के अन्त में (नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा
नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता इत्यादि से जीवके अपलाप द्वारा
इश्वरस्वातन्त्र्यका समर्थन कैसे सगत होगा 2
यदि किये केवल अज्ञ पुरुष की दृष्टि का अवलम्बन कर कर्मकाण्डप्रवृत्ति में
जीवस्वातन्त्रयवाद है, उसको शिथिल कर सम्पूर्ण भूतों में एकात्म्यज्ञान के लिए प्रवृत्त
विवेकद्रष्टि का अवलम्बन कर ईश्वरस्वातन्त्रयवाद है, उसके फलभूत ज्ञान से प्राप्त विवेकद्ृष्टि
का अवलम्बन करके (तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमवाह्यमयमात्मा ब्रह्म सवनुभूः” (यह
बरह्म कारणशून्य, कार्यरहित, अनन्तर, अबाह्य, स्वरूप से सवका अनुभव करनेवाला है),
“न कर्तृत्वं न कर्माणि” इत्यादि श्रुतिवाद और स्मृतिवाद है । जैसे स्वप्न और दर्पण आदि में
काष्ठहस्ती के धावन को हस्ती की दृष्टि से देखने पर हस्ती ही दौडता है न कि काष्ठ, काष्ठ
की दृष्टि से देखने पर काष्ठ ही दौड़ता है न कि हस्ती, परमार्थद्रष्टि से देखनेपर तो न हस्ती
है, न काष्ठ है ओर न धावन क्रिया ही है, केवल अविकृत पुरुष, दर्पण आदि ही हैं, वैसे ही ये
वाद है, तो मोक्ष के उपाय के प्रवर्तक श्रीवसिष्टजी का प्रस्तुत उपदेश अज्ञ पुरुषो के लिए है,
इसलिए यहाँ पर ईश्वरस्वातन्त्र्यवादका निराकरण उचित ही है । भगवान श्रीशंकरावार्यजी
का भाष्य भी है- “तमेतमविद्याख्यमात्मानात्मनोशारत्राणि विधिनिषेधमोक्षपराणि” (इस
अविद्यारूप आत्मा ओर अनात्मा के अन्योन्याध्यासर का अवलम्बन कर सभी प्रमाण, प्रमेय
आदि लौकिक व्यवहार ओर विधि, निषेध तथा मोक्षपरक सम्पूर्ण शास्त्र भी प्रवृत्त हैं) ।
इस प्रकार अज्ञानी जीव की दृष्टि से सिद्ध जीवस्वातन्त्र्य-पक् में प्राप्त कर्मो के अनुसार
नियन्त्रण करनेवाले इश्वर में वैषम्य और नैघृण्य दोष नहीं हैं, यह भाव है ।
संसार में हजारों जो व्यवहार हैं, उनमें लाभ और हानि हुआ करते हैं । उनमें राग और द्वेष
का त्यागकर शासत्रानुसार प्रयत्न करना चाहिए । कभी विच्छिन्न न हुई शारत्रानुकूल अपनी
मर्यादा का त्याग न कर रहे पुरुष को जैसे सागर में रत्न प्राप्त होते हैं, वैसे ही सम्पूर्ण अभीष्ट
प्राप्त होते हैं जिनसे सुखप्राप्ति और दुःखनिवृत्ति होती है, उन अवश्य कर्तव्य कार्यो में
प्रयत्नपूर्वक सदा तत्पर रहने को ही विद्वान लोग पौरुष कहते हैँ, उक्त तत्परता यदि
शास्त्रानुसार हो, तो वह परमपुरूषार्थकी साधक होती हे | देहसंचालनरूप क्रिया से (गुरु
सेवारूप कार्य से), सज्जनो के समागम एवं आत्मस्वरूप का प्रतिपादन करनेवाले सत्शास्त्रों
के अभ्यास से असंभावना, विपरीत भावना आदि दोषों के निराकरणपूर्वक तीक्ष्ण हुई बुद्धि से
आत्मा का जो स्वयं उद्धार किया जाता है, वह स्वार्थसाधकता हे । विद्वान लोग अन्तरहित एवं
अज्ञानकृत विषमता से शून्य परमार्थ वस्तु को (ब्रह्म) जानते हैं । उक्त परमार्थ वस्तु जिनसे
प्राप्त हो, उन शास्त्र ओर साधुओं की सदा सेवा करनी चाहिए । जो दोनों लोकों मे हित
करनेवाला पुरुष प्रयत्न है, देवलोक के भोग से अवशिष्ट वही पूर्वजन्म का पौरुष देवलोक से
यहाँ आये हुए पुरुष का 'दैव” कहलाता हे । यह ठीक है, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है
और इसकी हम निन्दा भी नहीं करते हैं । जो लोग मूढों द्वारा अपनी कपोलकल्पना से गढ़े हुए
"दैव" को मानते हैं, वे विनाश को प्राप्त हो गये हैं, यों हम उनकी निन्दा करते हैं। सदा अपने
पुरुषप्रयत्न से ही दोनो लोकों में हित होता है, जैसे कलका दुष्कर्म आजके सत्कर्म से शोभा
को प्राप्त होता है, वैसे ही वर्तमान जन्म के शुभ कर्मो से पूर्वजन्म के दुष्कर्म शोभा को प्राप्त हो
जाते हैं। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक शुभ कार्य में संलग्न होता है, उसका फल हाथ में रक्खे हुए
आँवले के समान पौरुष से ही साफ देखा गया है । जो प्रत्यक्षका त्यागकर दैवरूप मोह में
निमग्न होता है वह परम मूढ हे । हे श्रीरामचन्द्र, इसलिए अपनी कोरी कपोलकल्पना से उत्पन्न
अतएव मिथ्याभूत सम्पूर्ण कारण और प्रयोजनोँसे रहित "देव" की उपेक्षा कर अपने पौरुष का
अवलम्बन करो