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Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 20

9 verse-groups

  1. Verses 1–2उन्नीसर्वं सर्म समाप्त बीसवाँ सर्ग एक दूसरे को बढ़ानेवाले प्रज्ञाबुद्धि प्रकार, महापुरुषल…
  2. Verse 3हे श्रीरामजी, शम आदि गुणों से परिपूर्ण यह महापुरुषता यथार्थ ज्ञान के बिना किसी प्रकार की…
  3. Verses 4–5जैसे अन्नात्मक घृत आदि से युक्त यज्ञँ से धान आदि अन्नो की हेतु वृष्टि की अभिवृद्धि होती ह…
  4. Verse 6एक समय में परस्पर वृद्धि के अनुरूप दृष्टान्त को बतलाने के लिए उक्त वस्तु को ही पुनः कहते…
  5. Verses 7–8इसी प्रकार ज्ञान ओर सदाचार भी परस्पर अभिवृद्धि के कारण हैं, ऐसा कहते हैं। ज्ञान की सत्पुर…
  6. Verse 9हे श्रीरामचन्द्रजी, यहाँ जबतक ज्ञान ओर सदाचार का भली भाँति अभ्यास न किया जाय, तब तक उनमें…
  7. Verses 10–11उनकी अभिवृद्धि का फल भी एक ही समय में होता है, इसे दुष्टान्तपूर्वक कहते है । जैसे पके हुए…
  8. Verses 12–14हे रघुकुलतिलक, जैसे मैने इस प्रकार के इस सदाचारक्रम का आपको उपदेश दिया है, वैसे ही इस समय…
  9. Verse 15केवल साधनो के बल से ही नही, किन्तु ज्ञातव्य तत्त्व के स्वभाव से भी आप परम पद को प्राप्त ह…