Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 20, Verses 12–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 20, verses 12–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 12-14
संस्कृत श्लोक
सदाचारक्रमः प्रोक्तो मयैवं रघुनन्दन ।
तथोपदिश्यते सम्यगेवं ज्ञानक्रमोऽधुना ॥ १२ ॥
इदं यशस्यमायुष्यं पुरुषार्थफलप्रदम् ।
तज्ज्ञादाप्ताच्च सच्छास्त्रं श्रोतव्यं किल धीमता ॥ १३ ॥
श्रुत्वा त्वं बुद्धिनैर्मल्याद्बलाद्यास्यसि तत्पदम् ।
यथा कतकसंश्लेषात्प्रसादं कलुषं पयः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रघुकुलतिलक,
जैसे मैने इस प्रकार के इस सदाचारक्रम का आपको उपदेश दिया है, वैसे ही इस समय आगे
के प्रकरण में ज्ञानक्रम का आपको भलीर्भोति उपदेश देता हूँ। यह शास्त्र कीर्ति देनेवाला, आयु
बढानेवाला और पुरुषार्थरूपी फल देनेवाला है, बुद्धिमान् पुरुष को इस शास्त्र का इसे जाननेवाले
हितैषी गुरु से श्रवण करना चाहिए । जैसे निर्मली के चूर्ण का संसर्ग होने से मैला जल निर्मल हो
जाता है, वैसे ही इसका श्रवण कर के बुद्धि को दर्पण की नाई निर्मल करने के कारण आप
अवश्य ही उस परम पद को प्राप्त होगे