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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 20, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 20, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

विदितवेद्यमिदं हि मनो मुनेर्विवशमेव हि याति परं पदम् । यदवबुद्धमखण्डितमुत्तमं तदवबोधवशान्न जहाति हि ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल साधनो के बल से ही नही, किन्तु ज्ञातव्य तत्त्व के स्वभाव से भी आप परम पद को प्राप्त होंगे, ऐसा कहते है । मुनि का (प्रस्तुत साधनसम्पत्ति से मननशील पुरुष का) मन, जिसने ज्ञातव्य पदार्थ को जान लिया है, ऐसा होकर ज्ञातव्य पदार्था के बलसे ही विवश हो परम पद को प्राप्त होता हे । वह अज्ञान और उसके कार्य का तिरस्कार कर जागरूक हो अखण्डित उत्तम पद को नहीं छोडता, इसमें कुछ सन्देह नहीं हे