गाढ़ी निद्रा में न कोई रूप दिखता है, न कोई शब्द सुनाई देता है। नेत्र, श्रोत्र, मन, बुद्धि — सबकी गति वहाँ रुक जाती है। विषयों की पहुँच नहीं, इंद्रियों की पहुँच नहीं, यहाँ तक कि इंद्रियों के अधिष्ठाता देवताओं की भी पहुँच नहीं। फिर भी जागने पर मनुष्य कहता है — "मैं सुख से सोया।"
यह "मैं" कौन है, जो वहाँ भी शेष रहा जहाँ सब कुछ लीन हो गया? इसी गूढ़ प्रश्न का उत्तर गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस की एक चौपाई में दिया है — और मनीषियों के अनुसार यह चौपाई ब्रह्मसूत्र के एक अधिकरण पर भगवान शंकराचार्य के भाष्य का मंथन करके लिखी गई है।
सारांश: इस चौपाई में चेतना का उत्कर्ष-क्रम बताया गया है — विषय सर्वथा जड़ और ग्राह्य हैं; करण (इंद्रियाँ और अंतःकरण) ग्राहक होने से विषयों से उत्कृष्ट हैं; करणों को उद्दीप्त करने वाले अधिदैव (देवता) करणों से उत्कृष्ट हैं; और जीव देवताओं से भी उत्कृष्ट है, क्योंकि विषय, करण और देवता में भेद होने पर भी जीव में भेद नहीं होता। इन सबको — विषय, करण, सुर और जीव को — जिनकी विद्यमानता से चेतना प्राप्त होती है, वे परम प्रकाशक अनादि अवधपति श्रीराम हैं।
बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥
सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥
— श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड (दोहा 117 से पूर्व की चौपाई, शिव-पार्वती संवाद)
अन्वय — पदों का अर्थ
बिषय (विषय) — इंद्रियों के ग्राह्य पदार्थ: शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। ये सर्वथा जड़ हैं।
करन (करण) — कर्मेंद्रिय, ज्ञानेंद्रिय और अंतःकरण — इन सबका सम्मिलित नाम करण है। ये ग्राहक हैं।
सुर — करणों के अनुग्राहक एवं उद्भासक अधिष्ठाता देवता (अधिदैव)।
जीव — देह, इंद्रिय, प्राण और अंतःकरण का प्रयोक्ता चेतन आत्मा।
सकल एक तें एक सचेता — ये सब क्रमशः एक-दूसरे से अधिक चेतन हैं; चेतना का उत्कर्ष एक से दूसरे में बढ़ता जाता है।
सब कर परम प्रकासक — इन सबको प्रकाशित करने वाला सर्वोच्च चैतन्य।
राम अनादि अवधपति — जिनका कोई आदि नहीं, वे अयोध्या के स्वामी श्रीराम — परमदेव भगवत्तत्त्व।
विवेचना — चेतना का उत्कर्ष-क्रम
1. विषय — सर्वथा ग्राह्य, सर्वथा जड़
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध — ये पाँचों विषय चेतन नहीं हैं। इनका स्वरूप ही ग्राह्य होना है; ये स्वयं किसी को ग्रहण नहीं करते। इसलिए चेतना की इस सीढ़ी में विषय सबसे नीचे हैं।
2. करण — ग्राहक, अतः विषयों से उत्कृष्ट
करण शब्द में कर्मेंद्रिय-पंचक, ज्ञानेंद्रिय-पंचक और अंतःकरण — सब समाहित हैं। करणों के द्वारा विषयों का ग्रहण होता है — विषय ग्राह्य हैं, करण ग्राहक। करणों में चेतना की स्फूर्ति है, इसलिए वे विषयों की अपेक्षा उत्कृष्ट सिद्ध होते हैं।
यहाँ एक सूक्ष्म बात ध्यान देने योग्य है। गीता के "इन्द्रियाणि पराण्याहुः" (3.42) श्लोक में करण को तीन भागों में विभक्त किया गया है — इंद्रिय, मन और बुद्धि — और उसमें अधिदेव का वर्णन नहीं है। तुलसीदासजी ने इंद्रिय, मन, बुद्धि — सबको मिलाकर एक "करन" पद का प्रयोग किया और अधिदैव को स्पष्ट रूप से क्रम में स्थान दिया। एक ही चरण में इतना संग्रह — यही मानस की विलक्षणता है।
3. सुर — करणों के अनुग्राहक अधिदैव
प्रत्येक इंद्रिय के एक-एक उद्भासक देवता होते हैं — नेत्र-इंद्रिय के उद्भासक सूर्य हैं, वाक्-इंद्रिय के उद्भासक अग्नि। इन्हीं के अनुग्रह से इंद्रियों की प्रवृत्ति विषयों में परिलक्षित होती है।
इसका प्रमाण प्रत्यक्ष है — विश्व में नील, पीत, श्वेत आदि रूपों की भरमार हो, किंतु भुवन-भास्कर सूर्य का प्रकाश (साक्षात् अथवा विद्युत् आदि के माध्यम से) उपलब्ध न हो, तो नेत्र-संपन्न होने पर भी समस्त प्राणी अंधे सिद्ध होंगे। अनुग्राहक देवता का अनुग्रह न हो तो करण निष्क्रिय हैं। अतः अधिदैव करणों से उत्कृष्ट हैं।
4. जीव — देवताओं से भी उत्कृष्ट
यहाँ विवेचना अपने सूक्ष्मतम बिंदु पर पहुँचती है। ध्यान दीजिए —
विषय के भेद से करण में भेद प्राप्त होता है — रूप के लिए नेत्र, शब्द के लिए श्रोत्र। करण के भेद से अधिदैव में भेद प्राप्त होता है — नेत्र के सूर्य, वाक् के अग्नि। किंतु जीव में भेद प्राप्त नहीं होता। वही एक जीव तत्-तत् अनुग्राहक देवता के अनुग्रह से, तत्-तत् इंद्रिय के माध्यम से, तत्-तत् विषय का ग्रहण करता है। विषय अनेक, करण अनेक, देवता अनेक — किंतु जानने वाला एक। भेदों के बीच यह अभिन्नता ही जीव के उत्कर्ष का प्रमाण है।
दूसरा प्रमाण सुषुप्ति है। गाढ़ी निद्रा में विषय, करण और सुर — किसी की पहुँच नहीं है, किंतु जीव शेष रहता है। और तो और, सुषुप्ति में सुर के स्थान पर जीव स्वयं प्रतिष्ठित हो जाता है — वहाँ जीव ही चेतना-शक्ति का उद्दीपक सिद्ध होता है। जहाँ देवताओं की गति नहीं, वहाँ जीव देवताओं का भी कार्य करता है — यह जीव का देवताओं से उत्कर्ष है।
5. जीवभाव की महिमा — मनुष्य देवता से उत्कृष्ट कैसे?
यज्ञ की परंपरा में द्रव्य जड़ है, देवता चेतन हैं, और यजमान भी चेतन है — किंतु नरभावापन्न यजमान देवभावापन्न देवता से अवर (न्यून) सिद्ध होता है। यहीं एक विचित्र तथ्य है — देवता भी वस्तुतः जीव ही हैं; कर्म-विशेष और उपासना-विशेष के आलंबन से किसी जीव को देवयोनि प्राप्त होती है।
अब यदि देवता को केवल देवाभिमान ही हो — "मैं तत्त्वतः जीव हूँ" इस तथ्य में निष्ठा न हो — और किसी मनुष्य को यह निष्ठा हो जाए कि मैं देह-इंद्रिय-प्राण-अंतःकरण का प्रयोक्ता जीव हूँ, तो वह मनुष्य नरभावापन्न न रहकर जीवभावापन्न हो जाता है। लौकिक दृष्टि से वह देवता को मर्यादापूर्वक नमस्कार करेगा, किंतु तात्त्विक दृष्टि से वह उस अज्ञ देवता की अपेक्षा उत्कृष्ट सिद्ध होगा — क्योंकि उसकी तादात्म्य-निष्ठा देवताओं के भी नियामक मूल स्वरूप जीव में है।
6. सबके परम प्रकाशक — राम
किंतु यह क्रम जीव पर समाप्त नहीं होता। "सब कर" — अर्थात् विषय, करण, सुर और जीव — इन सबको जो चेतना प्राप्त होती है, जिनकी विद्यमानता से ये सब उद्भासित होते हैं, वह भगवत्तत्त्व — रामतत्त्व — है। जीव देवताओं से उत्कृष्ट है, और जीव से भी उत्कृष्ट परमदेव भगवान हैं — अनादि अवधपति श्रीराम।
माण्डूक्य उपनिषद् की दृष्टि — उन्नीस मुख और चेतोमुख
माण्डूक्य उपनिषद् के अनुसार जीव के उन्नीस मुख होते हैं। मुख का अर्थ है उपलब्धि-द्वार — जिनके द्वारा विषयों की उपलब्धि होती है। रावण के बाहर से दस मुख थे, किंतु भीतर से उसके भी उन्नीस मुख थे — और भीतर से हमारे भी उन्नीस मुख हैं।
उपनिषद् ने उन्नीस की संख्या कही, किंतु उन्नीस पदार्थ कौन-से हैं, इसका निरूपण नहीं किया। भगवान शंकराचार्य ने भाष्य में यह गणना पूर्ण की — पाँच कर्मेंद्रिय, पाँच ज्ञानेंद्रिय, पाँच प्राण, तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार (अंतःकरण-चतुष्टय) — कुल उन्नीस। आनंदगिरिजी ने भाष्य का तात्पर्य स्पष्ट किया कि प्राण वस्तुतः करण नहीं, करणकल्प हैं — क्योंकि उनके बिना कोई भी करण अपने विषय का ग्रहण या त्याग करने में समर्थ नहीं होता।
तीनों अवस्थाओं में इन करणों की स्थिति देखिए —
जाग्रत — सभी करण अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त रहते हैं।
स्वप्न — कर्मेंद्रियाँ और ज्ञानेंद्रियाँ सो जाती हैं; अंतःकरण अर्धनिद्रित होकर स्वयं ही इंद्रियों के रूप में व्यक्त होता है। स्वप्न के करण प्रातिभासिक कोटि के हैं — यदि वहाँ वास्तविक इंद्रियों की गति होती, तो मनोराज्य और स्वप्न में विभाजक रेखा ही विलुप्त हो जाती।
सुषुप्ति — उन्नीसों करणों की गति नहीं रहती; केवल चेतोमुख शेष रहता है — प्रज्ञा की बीजावस्था, जिसमें समस्त करण बीज रूप में लीन रहते हैं।
यही सुषुप्ति का विश्लेषण चौपाई के "जीव" पद की गहराई खोलता है — जहाँ विषय, करण और सुर की पहुँच नहीं, वहाँ भी जीव विद्यमान है।
अन्य शास्त्रों में यही विचार
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥
— श्रीमद्भगवद्गीता 3.42
गीता का यह श्लोक भी उत्कर्ष-क्रम ही बताता है — इंद्रियाँ पर हैं, इंद्रियों से मन, मन से बुद्धि, और बुद्धि से भी परे वह (आत्मा)। अंतर इतना है कि गीता में करण तीन भागों में विभक्त है और अधिदेव का उल्लेख नहीं है; तुलसीदासजी ने करण को एक पद में संगृहीत कर अधिदैव को क्रम में जोड़ दिया।
कठोपनिषद् (1.3.10) में भी यही क्रम है — इंद्रियों से विषय पर, विषयों से मन, मन से बुद्धि, बुद्धि से महान् आत्मा। और केनोपनिषद् ब्रह्म को "श्रोत्र का श्रोत्र, मन का मन, वाणी की वाणी, चक्षु का चक्षु" कहता है — मानस का "परम प्रकासक" इसी औपनिषद तत्त्व का रामनाम में प्रतिष्ठित रूप है।
सन्मुख होने का अर्थ
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
— श्रीरामचरितमानस
जब मुख का अर्थ उपलब्धि-द्वार अर्थात् करण है, तो "सन्मुख होना" का अर्थ स्पष्ट हो जाता है — कर्मेंद्रिय, ज्ञानेंद्रिय और अंतःकरण का भगवान के उन्मुख हो जाना; समस्त करणों का भगवान के अभिमुख होकर तन्निष्ठ, तत्परायण हो जाना। जो द्वार अब तक विषयों की ओर खुले थे, उनका भगवान की ओर खुल जाना — यही सन्मुखता है, और तभी करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट होते हैं।
लेखक का मत ✍️
इस चौपाई की महिमा यह है कि तुलसीदासजी ने ब्रह्मसूत्र के शांकरभाष्य का मंथन करके सिद्धांत का नवनीत मात्र सोलह शब्दों में भर दिया। जो विषय उपनिषदों और भाष्यों में अनेक अधिकरणों में फैला है — विषय-करण-अधिदैव-जीव का उत्कर्ष-क्रम, सुषुप्ति में जीव की स्थिति, और सबके मूल में स्वयंप्रकाश परमात्मा — वह सब "सकल एक तें एक सचेता" में समा गया। और सबसे बड़ी सांत्वना यह कि इस दर्शन के शिखर पर कोई निराकार शून्य नहीं, अनादि अवधपति विराजमान हैं — ज्ञान की सीढ़ी का अंतिम सोपान भक्ति के आँगन में खुलता है।
सार-सूत्र
पद स्वरूप उत्कर्ष का हेतु विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध — सर्वथा जड़ केवल ग्राह्य; ग्राहकता नहीं करण कर्मेंद्रिय + ज्ञानेंद्रिय + अंतःकरण ग्राहक; चेतना की स्फूर्ति सुर (अधिदैव) करणों के अनुग्राहक देवता — नेत्र के सूर्य, वाक् के अग्नि इनके अनुग्रह के बिना करण निष्क्रिय जीव देह-इंद्रिय-प्राण-अंतःकरण का प्रयोक्ता विषय-करण-देव में भेद, जीव में अभेद; सुषुप्ति में भी शेष राम — परम प्रकाशक अनादि अवधपति, भगवत्तत्त्व जिनकी विद्यमानता से सब उद्भासित
सामान्य प्रश्न (FAQ)
प्र. "बिषय करन सुर जीव समेता" चौपाई रामचरितमानस में कहाँ आती है और इसका आधार क्या है?
यह चौपाई बालकाण्ड में, दोहा 117 से पूर्व, शिव-पार्वती संवाद में आती है। मनीषियों के अनुसार तुलसीदासजी ने इसे ब्रह्मसूत्र के एक अधिकरण पर भगवान शंकराचार्य के भाष्य का मंथन करके लिखा है।
प्र. चौपाई में "करन" का क्या अर्थ है और यह गीता 3.42 से किस प्रकार भिन्न है?
करण का अर्थ है कर्मेंद्रिय, ज्ञानेंद्रिय और अंतःकरण — इन सबका समुदाय। गीता 3.42 में करण को इंद्रिय, मन और बुद्धि — तीन भागों में विभक्त किया गया है और अधिदेव का वर्णन नहीं है; तुलसीदासजी ने सबको एक "करन" पद में संगृहीत कर अधिदैव (सुर) को भी उत्कर्ष-क्रम में स्थान दिया।
प्र. जीव देवताओं से उत्कृष्ट कैसे सिद्ध होता है?
दो प्रमाणों से — पहला, विषय के भेद से करण में और करण के भेद से अधिदैव में भेद होता है, किंतु जीव में भेद नहीं होता; वही एक जीव सब करणों और देवताओं के माध्यम से सब विषयों का ग्रहण करता है। दूसरा, सुषुप्ति में विषय, करण और सुर की पहुँच नहीं रहती, किंतु जीव शेष रहता है — वहाँ जीव स्वयं ही चेतना-शक्ति का उद्दीपक होता है।
प्र. माण्डूक्य उपनिषद् के अनुसार जीव के उन्नीस मुख कौन-से हैं?
पाँच कर्मेंद्रिय, पाँच ज्ञानेंद्रिय, पाँच प्राण तथा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार — कुल उन्नीस। शंकराचार्यजी के भाष्य के अनुसार प्राण करणकल्प हैं, क्योंकि उनके बिना कोई करण विषय का ग्रहण-त्याग नहीं कर सकता। मुख का अर्थ है उपलब्धि-द्वार।
प्र. इस चौपाई का साधना में क्या उपयोग है?
जब साधक स्वयं को देह-इंद्रिय-प्राण-अंतःकरण का प्रयोक्ता जीव जानकर उसमें निष्ठा करता है, तो वह नरभाव से ऊपर उठकर जीवभावापन्न होता है — और जब समस्त करण भगवान के उन्मुख हो जाते हैं, तो "सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं" के अनुसार करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
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स्रोत:
श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड — शिव-पार्वती संवाद, दोहा 117 से पूर्व की चौपाइयाँ (गीता प्रेस, गोरखपुर संस्करण)
ब्रह्मसूत्र — शांकरभाष्य
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