सारांश: गर्ग संहिता के अनुसार, द्वापर युग में जब असुरों के अत्याचार से पृथ्वी माता त्राहिमाम कर उठीं, तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान् श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर अवतार लेने का निश्चय किया। किन्तु श्रीराधारानी ने कहा कि गोलोकधाम के वातावरण के बिना वे पृथ्वी पर नहीं रह सकतीं। तब भगवान् ने अपने गोलोकधाम से चौरासी कोस का दिव्य खण्ड अलग कर पृथ्वी पर उतारा — और इस प्रकार ब्रजभूमि प्रकट हुई। यही कारण है कि ब्रज की ८४ कोस की भूमि को साक्षात् गोलोकधाम का अंश माना जाता है।
हम सब ब्रजभूमि और मथुरा-वृंदावन के दर्शन करने जाते हैं — पर क्या आपने कभी सोचा है कि यह पावन भूमि पृथ्वी पर आई कैसे? किसने बसाई? और क्यों? गर्ग संहिता के गोलोकखण्ड में इसका जवाब है — और वो जवाब इतना अद्भुत है कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएँ।
तो बच्चों, आज एक बहुत पुरानी बात बताती हूँ। इतनी पुरानी कि उस ज़माने का नाम भी हम भूल गए हैं।
उस वक्त धरती माँ बहुत तकलीफ में थीं। सोचो ज़रा — वही धरती माँ जो हम सबको अपने सीने पर उठाए रहती हैं, जिनकी गोद में हम सोते हैं, जिनका अनाज खाते हैं — वो खुद दर्द में थीं। राक्षसों ने चारों तरफ तबाही मचा रखी थी। यज्ञ बंद थे, वेद दबे थे, अच्छे लोग डर के मारे छुप गए थे। और धरती माँ? वो सब सहती रहीं। चुपचाप। जैसे हर माँ सहती है।
पर एक दिन — बस, और नहीं हुआ।
धरती माँ रोने निकलीं
उस दिन धरती माँ ने सोचा — अब देवताओं के पास जाना होगा। पर कैसे जाएँ? कोई पहचानेगा कैसे? तो उन्होंने एक गाय का रूप लिया — एक छोटी सी, सीधी सादी, थकी हुई गाय। और चल पड़ीं।
अब देवताओं के दरबार में पहुँचीं तो कुछ बोला नहीं। बस खड़ी हो गईं। आँखों में आँसू थे। और बच्चों, जब कोई बिना बोले रोए — तब उसका दर्द सबसे ज़्यादा समझ आता है। देवता समझ गए। यह कोई आम गाय नहीं — यह तो धरती माँ हैं।
सबका मन भर आया।
अब इन्द्र देवता के पास वज्र था, वरुण के पास पाश था, अग्नि देवता की आग थी — पर उस दिन किसी का कोई हथियार काम का नहीं था। यह लड़ाई हथियारों से जीतने वाली नहीं थी। सब बड़े-बड़े देवता उस दिन छोटे लग रहे थे — समझे? बड़े से बड़ा इंसान भी कभी-कभी बेबस हो जाता है।
तब ब्रह्माजी उठे और बोले — "एक ही रास्ता है। भगवान् विष्णु के पास चलो।"
क्षीरसागर में एक गुहार
सब पहुँचे क्षीरसागर। वहाँ भगवान् विष्णु शेषनाग की शैय्या पर लेटे थे, बिल्कुल शांत — जैसे सारी दुनिया की चिंता उनको छू भी नहीं सकती। लक्ष्मी माँ पास में थीं। देवताओं ने सब बताया। धरती माँ — वो गाय के रूप में — खड़ी रहीं।
भगवान् विष्णु ने सुना। एक पल चुप रहे।
फिर बोले — "देखो, यह काम मेरे अकेले का नहीं है। जिनकी ताकत से यह सारी सृष्टि चलती है, जिनके बिना मेरा भी कोई वजूद नहीं — उनके पास जाना होगा।"
अब देवता सोचने लगे — भगवान् विष्णु से भी बड़ा कौन? ब्रह्माजी ने धीरे से पूछा — "कहाँ चलना है, प्रभु?"
भगवान् बोले — "गोलोकधाम।"
वो नाम सुनकर ब्रह्माजी के रोंगटे खड़े हो गए
बच्चों, गोलोकधाम का नाम सुना है कभी? यह कोई आम जगह नहीं है। वेद जिसके बारे में कहते हैं — "नेति नेति" — यानी "यह नहीं, यह नहीं" — क्योंकि शब्दों में बता ही नहीं सकते। जहाँ माया नहीं पहुँचती, काल नहीं पहुँचता, मन-बुद्धि भी वहाँ काम नहीं करते।
ब्रह्माजी — जिन्होंने खुद यह सारी सृष्टि बनाई थी — वो भी आज तक वहाँ नहीं गए थे। तो ज़ाहिर है, नाम सुनकर रोंगटे खड़े हो गए।
पर भगवान् विष्णु साथ थे। तो सब चल पड़े।
वो यात्रा जो शब्दों में नहीं आती
ऊपर। और ऊपर। और और ऊपर।
इन्द्रलोक नीचे छूट गया — वो इन्द्रलोक जिसे इन्द्र सबसे ऊँचा समझते थे। सप्तऋषियों के लोक पीछे रह गए। ध्रुव तारा — हज़ारों साल से जो एक ही जगह टिका है — वो भी नीचे दिखने लगा।
और रोशनी? वो कैसी थी जानते हो? न सूरज की, न चाँद की, न किसी दीये की। यह रोशनी तो जैसे खुशी से निकल रही हो। जैसे प्रेम का कोई रंग हो जो आँखों को दिखता हो। देवताओं की साँसें धीमी हो गईं। भीतर से कुछ जागने लगा।
और तभी — एक पल को सबकी चेतना ठहर सी गई।
सामने था — गोलोकधाम।
वो नज़ारा जो देखकर ब्रह्माजी रो पड़े
बच्चों, कभी सोचा है — करोड़ों सूरज एक साथ उगें तो कैसा लगे? गोलोकधाम उससे भी ज़्यादा चमकदार था। पर वो रोशनी आँखों को चुभती नहीं थी — उल्टा, जैसे थकान उतर रही हो। जैसे माँ ने सिर पर हाथ रख दिया हो।
यमुना बह रही थी वहाँ — और उसका पानी इतना साफ था कि नीचे की मणियाँ दिखती थीं। लहरें जब किनारे को छूती थीं तो संगीत होता था — किसी वाद्य का नहीं, सीधे दिल का। किनारे पर हरे पत्थर की सीढ़ियाँ थीं जिन पर रोशनी पड़े तो इन्द्रधनुष बन जाए।
कल्पवृक्षों के जंगल थे — हर पेड़ पर ऐसे फूल जो इस दुनिया में कहीं नहीं खिले। ठंडी हवा चलती थी और उसमें कमल का परागकण था जो उड़ता रहता था। साँस लो तो मन शांत हो जाए।
सोने जैसी गायें थीं — माथे पर तिलक जैसा निशान, इतनी शांत कि देखते रहो। उनके थनों से इतना दूध बहता था कि ज़मीन भीगी रहती थी। और गोपियाँ — वो मीठे सुर में गा रही थीं, उनके पायलों की आवाज़ हवा में घुली थी।
देवता भूल गए कि क्यों आए थे। बस देखते रहे।
वो मुस्कान जो करोड़ों कामदेव भी नहीं भूल सकते
और तब — बीचोबीच — एक सिंहासन।
सोलह पंखुड़ियों का बड़ा कमल, उस पर आठ पंखुड़ियों का कमल, उस पर विराजमान थे — भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र। मेघ जैसा साँवला रंग — पर ऐसा साँवला जो ठंडक दे। मोर का पंख मुकुट में। गले में वनमाला। हाथ में बाँसुरी — बज नहीं रही थी, पर उस खामोशी में भी जैसे सुर था।
और वो मुस्कान।
ब्रह्माजी — जिन्होंने लाखों साल तपस्या की थी, जिन्होंने यह पूरी सृष्टि बनाई थी — वो उस मुस्कान को देखकर रो पड़े। चारों मुखों से एक साथ आँसू। पर ये दुख के नहीं थे बच्चों — ये वो आँसू थे जो तब आते हैं जब जन्मों की तलाश पूरी हो जाए।
सबने साष्टांग प्रणाम किया।
भगवान् ने देखा। एक पल रुके। फिर वो गहरी आवाज़ गूँजी — "हाँ। मैं आऊँगा।"
पर तभी एक आवाज़ आई
देवता खुश हो गए। धरती माँ की आँखें — उस गाय के रूप में — पहली बार हल्की हुईं।
पर तभी —
एक आवाज़ आई। बहुत मीठी। बहुत कोमल। और उसमें एक हल्की सी उदासी थी जो सुनकर दिल रुक जाए।
श्रीराधारानी आगे आईं।
उनकी आँखों में वो प्रेम था जो इस सृष्टि की नींव है। और उस दिन उन आँखों में नमी भी थी। वो बोलीं —
"प्रभु... जहाँ यमुना नहीं, जहाँ गोवर्धन नहीं, जहाँ ये कुञ्ज नहीं, ये गायें नहीं — वहाँ मेरा मन नहीं टिकेगा। यहाँ की हर हवा मुझे जानती है। वहाँ... वहाँ मैं अजनबी हो जाऊँगी।"
यह कोई ज़िद नहीं थी। कोई शिकायत नहीं। बस एक सच्ची बात — जो सच्चे प्रेम में ही कही जाती है, बिना लाग-लपेट के।
भगवान् ने उन्हें देखा।
उस एक पल में — करोड़ों देवता थे, ब्रह्माजी थे, सब थे — पर जैसे सब पीछे हट गए। वो पल सिर्फ उन दोनों का था।
और भगवान् मुस्कुराए।
वो फैसला जो आज भी महसूस होता है
भगवान् बोले — "राधे, तुम चिंता मत करो। जो तुम्हें चाहिए — वो सब वहाँ होगा।"
और फिर जो हुआ — वो इस सृष्टि में पहले कभी नहीं हुआ था। और शायद बाद में भी नहीं होगा।
भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने गोलोकधाम से चौरासी कोस का हिस्सा अलग किया — और पृथ्वी पर उतार दिया।
सोचो ज़रा — जैसे माँ अपने बच्चे को दूर भेजते वक्त घर की मिट्टी बाँध देती है। जैसे कोई अपनी सबसे प्यारी चीज़ दे दे — बिना सोचे, बिना माँगे — सिर्फ इसलिए कि प्रेम यही कहता है।
वो चौरासी कोस की भूमि जब उतरी — जहाँ रेत थी वहाँ यमुना बह निकली, जहाँ पत्थर थे वहाँ कल्पवृक्ष उग आए, जहाँ कुछ नहीं था — वहाँ ब्रजभूमि हो गई।
शास्त्रों से ज्ञान 📖
कृष्णं स्वयं विभजिताण्डपतिं परेशं साक्षाद्धकण्डमितदेवमतीवलीलम्।
कार्यं कदापि न भविष्यति यं विना हि गच्छाशु तस्य विशदं पदमव्ययं त्वम्॥"वे स्वयं श्रीकृष्ण हैं — ब्रह्माण्डों के स्वामी, परमेश्वर, परात्पर पुरुष। जिनके बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता — शीघ्र उनके उस अव्यय, विशद धाम की शरण लो।"
— गर्ग संहिता, गोलोकखण्ड, अध्याय २
इसीलिए ब्रज की माटी सबसे अलग है
अब समझे — ब्रजभूमि कोई राजाओं का बसाया शहर नहीं है। कोई तीर्थ नहीं जो इंसानों ने बनाया हो। यह तो वो जगह है जो खुद भगवान् ने — अपनी प्रिया के प्रेम के लिए — स्वर्ग से उठाकर पृथ्वी पर रखी।
और इसीलिए आज भी — जो ब्रज जाता है, उसे कुछ अलग लगता है। एक अजीब सी शांति। एक अजीब सा अपनापन। जैसे यह जगह पहले से जानी हो — किसी जन्म में, किसी वक्त में।
वो "कुछ" — वही है जो गर्ग संहिता कहती है। वो गोलोक की याद है — जो राधारानी के एक वाक्य से, और भगवान् की एक मुस्कान से, हमारे बीच उतर आई।
तो अगली बार जब भी ब्रज जाओ — और माटी माथे से लगाओ — याद रखना। यह कोई मिट्टी नहीं है। यह गोलोक का टुकड़ा है।
सामान्य प्रश्न
प्रश्न: ब्रजभूमि चौरासी कोस की क्यों है?
गर्ग संहिता के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने गोलोकधाम से ठीक चौरासी कोस का दिव्य खण्ड पृथ्वी पर प्रकट किया था। यह श्रीराधारानी के लिए किया गया था जो गोलोक के वातावरण के बिना पृथ्वी पर रहने को तैयार नहीं थीं।
प्रश्न: क्या ब्रजभूमि सच में गोलोकधाम का हिस्सा है?
हाँ। गर्ग संहिता स्पष्ट कहती है कि ब्रजभूमि गोलोकधाम का ही एक अंश है जो भगवान् की इच्छा से पृथ्वी पर प्रकट हुआ। इसीलिए ब्रज की भूमि, यहाँ की यमुना और गोवर्धन को साक्षात् दिव्य धाम माना जाता है।
प्रश्न: पृथ्वी माता ने गाय का रूप क्यों धारण किया?
गाय धरती, पोषण और निरीहता का प्रतीक है। पृथ्वी माता ने यह रूप इसलिए धारण किया क्योंकि यह उनकी वास्तविक अवस्था थी — थकी हुई, असहाय, पर निरंतर सहने वाली। इस रूप में उनका दर्द बिना शब्दों के भी सब समझ सके।
प्रश्न: गोलोकधाम देवताओं को पहले क्यों नहीं पता था?
गर्ग संहिता में नारदजी बताते हैं कि गोलोकधाम माया और त्रिगुण से परे है — मन, बुद्धि, अहंकार वहाँ प्रवेश नहीं कर सकते। देवता भी माया के दायरे में हैं, इसीलिए वे वहाँ स्वयं नहीं जा सकते थे। भगवान् विष्णु के साथ ही यह संभव हुआ।
Sources
- गर्ग संहिता, गोलोकखण्ड — अध्याय १ (ब्रह्माजी-नारद संवाद, देवताओं की व्यथा)
- गर्ग संहिता, गोलोकखण्ड — अध्याय २ (ब्रह्मादि देवों द्वारा गोलोकधाम का दर्शन)
- गर्ग संहिता, गोलोकखण्ड — अध्याय ३ (भगवान् के अवतार लेने का निश्चय, श्रीराधाजी की चिंता और भगवान् का उत्तर)
- गीता प्रेस, गोरखपुर संस्करण
