Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 30
उनतीसवाँ सर्ग समाप्त तीसवाँ सर्ग जिस दृष्टि से अविद्याजनित नानात्वभ्रान्ति की शान्ति द्वारा धीर पुरुष परमब्रह्म में स्थिर हो जाता है, उस दृष्टि का वर्णन।
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- Verse 1जब तक अहम्भाव परित्यक्त नहीं होता, तब तक ब्रह्मविकार भी नहीं हो सकता, फिर बलह्मनाभ तो दूर…
- Verse 2भद्र, जैसे धूम्रज्ञान अग्निज्ञान का हेतु पर्याप्त है, वैसे ही अज्ञान से उत्पन्न अहन्ता ही…
- Verse 3हे श्रीरामजी, इस अहन्तारूपी मल का सर्वथा त्यागकर निर्मल हो चिदाकाश की नाई मोक्षस्वरूप ज्ञ…
- Verse 4अहन्ता के दूर चले जाने से ज्ञानी पुरुक निर्मल ओर विक्षेपशून्य परिपूर्ण हो जाता हैं, यह वर…
- Verse 5जैसे चित्रलिखित युद्ध में परस्पर प्रहार कर रही भी सेनाएँ क्षुब्ध-सी प्रतीत होने पर भी अक्…
- Verse 6जो ज्ञानी पुरुष है उसकी वासना वासना ही नहीं है, क्योंकि वह निर्वाण स्वरूप बन गया है । जैस…
- Verse 7जैसे तैर रहे तरगों से युक्त समुद्र पूर्णरूप से जल ही है, वैसे ही दृश्य से वर्धित ब्रह्माण…
- Verse 8ज्ञानी पुरुष में भीतर-बाहर सबकी वासनाएँ बाधित हो बुकी हैं; इसमें क्या प्रमाण 2 इस थका पर…
- Verse 9ज्ञानस्वरूप अज्ञात आत्मा में अहन्ता की सृष्टि के रूप से ज्ञानरूप आत्मा ही ऐसे भासित होता…
- Verse 10जैसे आकाश में स्फुरित हो रहे नीहारधूम्र के हाथी, रथ आदि आकार दिखाई देते है, परन्तु वे आका…
- Verse 11अब महाराज वस्तिष्ठजी सशरी श्रोताओं को सम्बोधित कर कहते हैं / हे उपस्थित विद्वानों, आप लोग…
- Verse 12किस तरह की वह संविद्-भ्रान्ति अज्ञानियों द्वारा अनुभूत होती है, यह कहते है/ जैसे अंकुर अ…
- Verse 13उसमें किस तरह का विचार होता हैं, यह कहते हैं ।/ बाह्य रूपालोक की सत्ता तथा आन्तरिक मन की…
- Verse 14इसलिए हे श्रोताओं, यह सारा संसार जैसे उत्पन्न होता है, जैसे स्थित है, जैसे अपने कार्यों क…
- Verse 15इष्ट और अनिष्ट वस्तुओं की प्राप्ति के लिए व्यवहार कर रहा भी मुक्त पुरुष मुर्दे के सदृश अन…
- Verse 16जो जीवन्मुक्त पुरुष हैं उनकी अहन्ता मनोजनित वासना से रहित ही है | वह अहन्ता देहनाश-पर्यन्…
- Verse 17इन सव बातों से निष्कर्ष यही निकला कि जीव जगत् की जड़रूप से सत्ता मान लेना ही अनर्थ है, इ…
- Verse 18जो मृत पुरुष के द्वारा प्राप्त किया जानेवाला स्वर्ग है, वह क्या जीवित पुरुष द्वारा किसी त…
- Verse 19मोक्षरूप परमपुरुषार्थ मानने की आवश्यकता क्या है 2 ग्रांकल्पिक स्वर्ग आदि फलों मे से किसी…
- Verse 20न तो अन्य कोई है ओर न मैं ही हूँ, इस तरह की अनहंभावना से आप निर्भय हो जाइये । अज्ञदृष्टि…
- Verse 21सरमे चत्यता का उपपादन करते है / जड-देहादि से लेकर चित्तपर्यन्त सम्पूर्ण शरीर विचारकर देखन…
- Verse 22यही कारण है कि सम्पूर्ण शान्ति की कीमारूफी मोक्ता अहंकार की शन्ति ही हैं / जैसे जमे हुए घ…
- Verse 23इस मुक्ति मे, भोगों का त्याग, विचार, इन्द्रिय, तथा मनका निग्रहरूप पौरुष इन तीनों के सिवा…
- Verse 24इस प्रकार अहन्ता के नाशक सम्पूर्ण द्वैतनाशपूर्वक जो ब्रह्मभाव से मन की स्थिति है, उसी को…
- Verse 25इसलिए शास्त्रों मे दृढ विश्वास करके "जगत् और अहन्ता-ये दोनों असत् हैं, इसको” श्रवण, मनन…