Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
रूपालोकमनःसत्ता ज्वालार्चिष्विव दण्डता ।
सत्योपि च न सन्त्येता भ्रान्तेश्चित्ताबला इव ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें किस तरह का विचार होता हैं, यह कहते हैं ।/
बाह्य रूपालोक की सत्ता तथा आन्तरिक मन की सत्ता ये सब अधिष्ठानरूप से सत्य होती
हुई भी अपने स्वरूप से ऐसे सत्य नहीं हैं, जैसे भ्रमणशील हो रहे अलात की ज्वालार्चि में
दण्डचक्रादिरूपता या विधुर पुरुषों के चित्त मेँ कल्पित कामिनी महिलाएँ अपने स्वरूप से सत्य
नहीं हैं