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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

भोगत्यागविचारात्मपौरुषान्नान्यदत्र हि । उपयुज्यत इत्यज्ञाः स्वात्मैवाशु प्रणम्यताम् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

इस मुक्ति मे, भोगों का त्याग, विचार, इन्द्रिय, तथा मनका निग्रहरूप पौरुष इन तीनों के सिवा ओर कोई दूसरा उपयोगी नहीं है, यह निश्चय करके हे अज्ञ, मुमुक्षुओं, आत्मभिन्न सबका त्यागकर शीघ्र अपनी आत्मा की ही शरण मेँ जाओ