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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 207

दो सौ ्पौँचर्वौँ सर्ग समाप्त दोसौ छठवाँ सर्ग बरह्म ही सत्‌ है जगत्‌ की सत्ता नहीं है इसके निर्णय में कारणभूत कुशद्रीपेश्वर द्वारा कथित प्रश्नों का निरूपण ।

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  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, श्रीरामचन्द्रजी, विना कारण के जिस जगद्भान का स्फुरण होता है व…
  2. Verse 2हे महाबुद्धे, कभी किसी ने मुझसे प्रश्न किये थे इस विषय में सम्यक्‌ ज्ञान की खूब पुष्टि के…
  3. Verses 3–18शून्य प्रदेश में शरीर के प्रति उपादान कारण कौन होगा अथवा निमित्त कारण कौन होंगे ? शंका :…
  4. Verses 19–21सम्पूर्ण लोक, वेद आदि का विरोध होने से भी नास्तिक पक्ष ग्राह्य नहीं है, ऐसा कहते हैं। प्र…
  5. Verse 22हे ब्रह्मन्‌, जगत्‌ पहले असत्‌ था पश्चात्‌ सत्‌ हुआ जेसे-“असद्रा इदमग्र आसीत्‌ ततो वै सदज…
  6. Verses 23–28भगवन्‌, एक ही पुरुष के मित्र ने प्रयाग आदि मनोवांच्छित फल देनेवाले क्षेत्र मे उसके जीवन क…
  7. Verse 29भगवन्‌, मैं घर से बाहर नहीं निकलता हुआ भी कल्पनापर्यन्त सप्तद्रीपों का अधीश्वर होकर घर पर…
  8. Verse 30दान, धर्म आदि तपस्याओं तथा अन्त्येष्टि क्रिया, श्राद्ध आदि कर्मो का अदृष्ट जहाँ क्रिया हु…
  9. Verses 31–32यदि कहिये कि व्यवहार करनेवाला जीव और उसमें समवाय सम्बन्ध से स्थित उसका अदृष्ट जिस जगह उसक…
  10. Verse 33इत्यादि असमंजस कैसे समंजस होगा ? मेरे मन में उठे हुए इन सकल सन्देहो को शीतल और उज्ज्वल वा…
  11. Verses 34–38हे भगवन्‌, परमात्मा के विषय में उपदेश द्वारा सकल संशयो का विनाश करने से हजारों विरुद्ध फल…