Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 207, Verses 19–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 207, verses 19–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 207 · श्लोक 19-21

संस्कृत श्लोक

तत्र तावद्दिशः शैलाः पृथ्व्यादि नगरादि च । सर्वं चिन्मयमाकाशमिति ते स्वानुभूतिमत् ॥ १९ ॥ संविद्व्योम घनं ब्रह्म तत्सकल्पपुरं विराट् । शुद्धसंविन्मयो ब्रह्मा तदिदं जगदुच्यते ॥ २० ॥ ब्राह्मे संकल्पनगरे यद्यत्संकल्पितं यथा । तथानुभूयते तत्तत्त्वत्संकल्पपुरे यथा ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण लोक, वेद आदि का विरोध होने से भी नास्तिक पक्ष ग्राह्य नहीं है, ऐसा कहते हैं। प्रजाजन राजा की आज्ञा आदि से, जो स्वेच्छा चेष्टा आदि के अगोचर हे, दूर देशान्तर मेँ हैँ, अतएव सम्बन्ध रहित हैं ओर अमूर्त भी हैं, वध, बन्धन, दण्ड आदि फल पाते हैँ इसमें कौन उपपत्ति है ? दूसरी बात यह है कि पत्थर, लोहे आदि का खम्भा देवता, मुनि आदि के वरदान से सुवर्ण की प्राप्ति के लिए गमन, आगमन आदि किये बिना ही जहाँ पर क्षणभर में सोने का हो जाता हे वहाँ पर वह सम्पत्ति किस उपपत्ति से है यह किये । ओर भी सुनिये, अचेतन होने के कारण प्रयोजनसिद्धिरूप निमित्त के विना ही प्रवृत्त हो रहे विधि प्रतिषेधरूप शास्त्रों का क्या प्रयोजन है, जो कि प्रचार द्वारा लोक में प्रसिद्ध हैँ किसी के द्वारा अनुष्ठान न होने से अप्रसिद्ध हैँ, यह बतलाने की कृपा कीजिये ?