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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 207, Verses 3–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 207, verses 3–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 207 · श्लोक 3-18

संस्कृत श्लोक

इदमित्थमिति प्रोता यत्र संवित्तदेव तत् । भवत्यवश्यं तत्त्वङ्ग सदेवास्त्वसदेव वा ॥ ३ ॥ ईदृक्स्वभावा संवित्तिस्तया देहो विभाव्यते । एक एव स्वरूपेण तस्यास्ते न च तद्विदा ॥ ४ ॥ आश्रितस्वप्नसंदर्शस्तथेदं भासते जगत् । समस्तकारणाभावात्सर्गादावन्यतात्र का ॥ ५ ॥ एवं यदेव विमलं वेदनं ब्रह्मसंज्ञितम् । तदेवेदं जगद्भाति तत्केव जगतोऽन्यता ॥ ७ ॥ एवं पूर्वापरं शुद्धमविकार्यजगत्स्थितेः । लोकवेदमहाशास्त्रैरनुभूतमुदाहृतम् ॥ ८ ॥ अपलाप्यैव ये मूढा अन्धकूपकमेकवत् । समस्तभूतसंवित्तौ रूढपूर्णं महात्मभिः ॥ ९ ॥ वर्तमानानुभवनमात्रमोहप्रमाणकाः । शरीरकारणा संविदिति मोहमुपागताः ॥ १० ॥ उन्मत्ता एव तेऽज्ञास्ते योग्या नास्मत्कथासु ते । अक्षीबक्षीबयोर्मूढबुद्धयोः कैव संकथा ॥ ११ ॥ यया विपश्चित्कथया सर्वसंशयसंक्षयः । न भवेत्र्त्रिषु लोकेषु ज्ञेया मूर्खकथैव सा ॥ १२ ॥ प्रत्यक्षमात्रनिष्ठोऽसौ मूढास्थ इति वक्ति यत् । तेन निर्युक्तिनोक्तेन शिलासदृशवृत्तिना ॥ १३ ॥ प्रोक्तः सर्वविरुद्धेन सोऽज्ञः कूपान्धदर्दुरः । पूर्वापरधियं त्यक्त्वा वर्तमाने मतिस्थितः ॥ १४ ॥ संविदेव शरीरं चेच्छवं कस्मान्न चेतति । इति यस्य मतिस्तस्मै मूढायेदमिहोच्यते ॥ १५ ॥ ब्रह्मणो ब्रह्मरूपस्य संकल्पनगरं ततम् । इदं तावज्जगद्भानं तव स्वप्नपुरं यथा ॥ १७ ॥ तत्समस्तं सदैवेदं चिन्मात्रात्म निरन्तरम् । भवत्यत्र न ते भ्रान्तिः स्वे स्वप्ननगरे यथा ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

शून्य प्रदेश में शरीर के प्रति उपादान कारण कौन होगा अथवा निमित्त कारण कौन होंगे ? शंका : धर्म और अधर्म ही देह के आकार में परिणत हो जायेंगे ? समाधान-धर्म ओर अधर्म दोनों अमूर्त हैं उन अमूर्तों की मूर्तता असमंजस है । अद्रव्य (द्रव्यभिन्‍न) धर्म और अधर्म द्रव्यों द्वारा (पार्थिवयुक्त) नहीं है । वहाँ माता-पिता आदि का अभाव है, अतः क्या उपादान कारण होगा ओर बीज के अभाव से उपर्युक्त धर्मअधर्म का देहाकार में परिणाम असमंजस है। धर्म ओर अधर्म करनेवाले का परलोक नहीं है यह नास्तिक पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योकि सही जन्म (वर्तमान जन्म) पूर्व जन्म की अपेक्षा परलोक है। और यह जन्म संवेदन के अनुसार स्थित है