Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 205
ढो सौ तीनवाँ सर्ग समाप्त दोसौ चारवाँ सर्ग श्रीवसिष्ठजी तथा श्रीरामजी का चिदात्मा के परिशोधन के लिए निष्कृष्ट युक्ति से फिर चित् में दृश्य का परिमार्जन करना |
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे महावाहो, हे श्रीरामचन्द्रजी, फिर मेरा परम संक्षिप्त (युक्तियों स…
- Verses 2–4है और स्मरण के समान पदार्थशून्य स्वरूप होकर सामने आता है, इसलिए वह संविद् संवेदनमात्र हो…
- Verses 5–7श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, चित् में यह भूमि कैसे संपन्न हुई, पर्वत कैसे सम्पन्न हु…
- Verses 8–11श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवर, जरा कहिये तो सही स्वप्न में दिखाई दिये महानगर में कैसे वा…
- Verse 12दृष्टान्त के (स्वप्नद्श्य के) समान ही दार्ष्टान्तिक में (जग्रत् दृश्य मे) भी परथिवी आदि…
- Verse 13इसका निराधार निराकार आत्मा ही व्योमरूप है, आकृति के अभाव में इस व्योम का आधार से क्या प्र…
- Verse 14पृथिवी आदि आकारसम्पक्ति को मानकर यह कहा गया है, वास्तव में पृथिवी आदि सम्पत्ति भी नहीं है…
- Verses 15–37और मन भी केवल चित् का स्फुरण है, अतः वही सव कुछ है, ऐसा कहते हैं। सकल तत्त्ववेत्ता की दृ…