Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 205, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 205, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 205 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
सर्गाणां कोटयः प्रोक्ता भगवन्भवता किल ।
काश्चिद्ब्रह्माण्डकोशस्थाः काश्चिदण्डविवर्जिताः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
दृष्टान्त के (स्वप्नद्श्य के) समान ही दार्ष्टान्तिक में (जग्रत् दृश्य मे) भी परथिवी आदि की
सम्पत्ति की संभावना कर रहे श्रीरामचन्द्रजी स्वयं भी जगत् की असत्यता का वर्णन करते हैँ ।
स्वप्नरूप इस जगत् का स्वरूप निराकार निराधार आकाश ही हे । भूमि, पर्वत आदि सत्य नहीं
हैं