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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 205, Verses 15–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 205, verses 15–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 205 · श्लोक 15-29

संस्कृत श्लोक

काश्चिद्वातात्मभूतौघाः काश्चिन्नित्यं तमोधराः । व्योमसंस्थानकाः काश्चित्काश्चित्क्रिमिकुलाकुलाः ॥ १५ ॥ काश्चिदाकाशकोशस्थाः काश्चिच्चोपलकोशगाः । काश्चित्सकुण्डकोशस्थाः काश्चित्खे खगवत्स्थिताः ॥ १६ ॥ तासां मध्ये यथा हीदं ब्रह्माण्डं यादृशं स्थितम् । अस्माकं भगवंस्तन्मे ब्रूहि तत्त्वविदां वर ॥ १७ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । यदपूर्वमदृष्टं वा नानुभूतं न वा श्रुतम् । तद्वर्ण्यते सुदृष्टान्तैर्गृह्यते च तदूह्यते ॥ १८ ॥ इदं तु राम ब्रह्माण्डमागमैर्मुनिभिः सुरैः । शतशो वर्णितं तच्च ज्ञातमेतत्त्वयाऽखिलम् ॥ १९ ॥ यथेदं भवता ज्ञातमागमैर्वर्णितं यथा । स्थितं तदेतदखिलं किमन्यदिह वर्ण्यते ॥ २० ॥ श्रीराम उवाच । कथमेतद्वद ब्रह्मन्संपन्नं चिन्महानभः । कियत्प्रमाणमेतद्वा कियत्कालं च वा स्थितम् ॥ २१ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । अनादिनिधनं ब्रह्म नित्यमस्त्येतदव्ययम् । आदिमध्यान्तता नास्ति नाकाराः परमाम्बरे ॥ २२ ॥ ब्रह्माकाशमनाद्यन्तमेतदव्ययमाततम् । एतन्मयमिदं विश्वं विष्वगाद्यन्तवर्जितम् ॥ २३ ॥ परमस्यास्य चिद्व्योम्नः स्वयं यद्भानमात्मनि । तदेतद्विश्वमित्युक्तं स्वयं तेनैव तन्मृषा ॥ २४ ॥ पुरुषस्य यथा स्वप्नपुरसंदर्शनं तथा । तत्तस्य भानं पुरवत्तदिदं विश्वमुच्यते ॥ २५ ॥ कठिना नेह गिरयो न द्रवाणि जलानि च । न शून्यमेतदाकाशं कालो न कलनात्मकः ॥ २६ ॥ यद्यथा चाव्ययं यत्र स्वतः संचेतितं चिता । तत्तथा तत्र चित्तत्त्वे अलं शैलादिवत्स्थितम् ॥ २७ ॥ अशिलैव शिला स्वप्ने नभ एवानभो यथा । भवेत्तथेह सर्गादि स्वप्ने दृश्यस्थितिश्चितौ ॥ २८ ॥ अनाकारैव चिच्छान्ता स्वप्नवत्यत्स्वचेतनम् । वेत्ति तज्जगदित्युक्तं तच्चानाकारमेव सत् ॥ २९ ॥ वायोः स्पन्दो यथान्तस्थो वात एव निरन्तरः । तथेदं ब्रह्मणि ब्रह्म न चोदेति न शाम्यति ॥ ३० ॥ द्रवत्वमम्भसि यथा शून्यत्वं नभसो यथा । यथा वस्तुनि वस्तुत्वं ब्रह्मणीदं जगत्तथा ॥ ३१ ॥ न प्रयातं न वाऽऽयातमकारणमकारणात् । न च नास्ति न वास्तीदं भिन्नं ब्रह्मपदे जगत् ॥ ३२ ॥ न चानादि निराभासं निराकारं चिदम्बरम् । दृशः कारणमन्यस्याः क्वचिद्भवितुमर्हति ॥ ३३ ॥ तस्माद्यथावयविनोऽवयवाः स्वात्ममात्रकाः । तथानवयवे ब्रह्मव्योस्नि व्योम जगत्स्थितम् ॥ ३४ ॥ सर्वं शान्तं निरालम्बं ज्ञप्तिमात्रमनामयम् । नेह सत्ता न वासत्ता न च नानास्ति किंचन ॥ ३५ ॥ संकल्पस्वप्ननगरनृत्तवत्सर्वमाततम् । स्थितमेव समं शान्तमाकाशमजमव्ययम् ॥ ३६ ॥ परमचिदम्बरहृदयं चित्त्वाद्यत्कचति कान्तममलमलम् । तदिदं जगदिति कलितं तेनैव तदात्मरूपमाकल्पम् ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

और मन भी केवल चित्‌ का स्फुरण है, अतः वही सव कुछ है, ऐसा कहते हैं। सकल तत्त्ववेत्ता की दृष्टि में उस प्रकार का बोध होने से यहाँ पर दिशा, काल आदि चित्‌ का भान है, पर्वत आदि चिद्भान हे, जल आदि चित्‌ है एवं वायु आदि चिदाकाश हे । संवित्‌ ही आकाशता को प्राप्त होकर आकाशरूप से स्थित है, काठिन्य से वह पत्थर के रूप से स्थित है और द्रववश वह जल के समान स्थित है। वास्तव में भूमि आदि कुछ भी नहीं है, इसलिए वह सब एक अनन्त चिदाकाश पृथिवी आदि के रूप से स्थित हे । प्रसन्न (निश्चल) सागर का जल द्रवरूप होने के कारण ही जैसे तरंग फेन, आवर्तं आदि (अभिन्न) होता हुआ ही अपने में नाना होता है । चिति अपने में काठिन्य के संकल्प से पृथिवी की तरह गिरिता को प्राप्त हुई है, चिति अपने में शून्यता के वेदन से आकाश की तरह अपने को शून्य जानती है । अपने में द्रवत्व के वेदन से जल मानती है, अपने में स्पन्दता के वेदन से वायु जानती है, अधिष्ठान चिद्रूप अपने स्वरूप का त्याग न कर रही चिति उष्णता के वेदन से अग्नि को जानती है । इस प्रकार के स्वभाववाला ही यह आकाशरूप चित्‌धातु बिना कारण, विना गुण और विना क्रम के जो कुछ इस प्रकार स्फुरित होता है उसके अतिरिक्त जगत्‌ का तत्त्व वैसे ही यहाँ कुछ नहीं हे जैसे कि आकाश ओर सागर में शून्यता ओर जल के सिवा अन्य तत्त्व कुछ नहीं हे । "इदम्‌" (यह) त्वम्‌" (तुम) ओर “अहम्‌” (मैं) इत्यादि जगत्‌ चिदाकाश के अतिरिक्त नहीं हे, क्योकि उसके बिना कुछ भी संभव नहीं है इसलिए आप पूर्ण शान्त होकर स्थित होइये । आप जैसे इस घर में स्वप्न, मनोरथ आदि से अग्निपर्वत आदि की बुद्धि करते हुए अग्नि पर्वत न होते हुए भी उसको अग्निपर्वत देखते हैं वैसे ही निराकार चिदाकाश को जगत्‌ के रूप में देखते है । सृष्टि के आदि मेँ चिदाकाश ही देहतुल्य प्रतीत होता है तब बिना कारण के असत्‌ से (अज्ञान से) देहाकार चिति उदित होती है, वास्तव में देह उदित नहीं होता है, यह ज्ञानीजनों को विचार करना चाहिए। मन, बुद्धि, अहंकार, पंच महाभूत, पर्वत ओर दिशाएँ ये सब शिलागर्भ के समान यथास्थित अनिवार्य हे । इस तरह न कुछ उत्पन्न हुआ है न कुछ नष्ट हुआ है यथास्थित यह जगत्रूप ब्रह्मात्मा में स्थित नामक जो स्वरूप का प्रकर्ष से बृंहण हे वही यह जगत्‌ कहा गया हे यथार्थ सम्यक्‌ दर्शन से प्रबुद्ध बुद्धिवाले की दृष्टि से यह जगत्‌भाव से भान भी अभान ही है यानी वास्तव में शून्य चिदाकाश ही है अप्रबुद्धबुद्धिवाले यानी मूर्ख की दृष्टि से जैसा तेसा हो उसके विचार से क्या प्रयोजन है, यह अर्थ हे