Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 205, Verses 8–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 205, verses 8–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 205 · श्लोक 8-11
संस्कृत श्लोक
यदेतद्वेदनं नाम चिद्व्योम्नो व्योमनिर्मलम् ।
एतदन्तश्चितो रूपं स्वप्नो जगदिति स्थितम् ॥ ८ ॥
एतस्मिन्नेव तेनाथ स्वभावकचने तते ।
चिद्रूपेण कृताः संज्ञाः पृथक्पृथ्व्यादिका इमाः ॥ ९ ॥
चिद्भानमेव तत्स्वप्नजगच्छब्दैः प्रकथ्यते ।
भानं चास्याः स्वभावः खं तत्कदाचिन्न शाम्यति ॥ १० ॥
बह्वयः सर्गदृशो भिन्ना ब्रह्मेव ब्रह्मखे च ताः ।
शून्यतानभसी वातस्तिष्ठन्ति च विशन्ति च ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवर, जरा कहिये तो सही स्वप्न में दिखाई दिये महानगर में कैसे
वास्तविक रूप से भूमि हो गई, केसे आकाश हो गया, कैसे जल हो गया, कैसे पत्थर हो गये, कैसे तेज
हो गया, कैसे दिशाएँ हो गई, कैसे काल हो गया ओर कैसे क्रिया हो गई ? उन सबके निमित्त आदि सब
कैसे हो गये यह मुझसे कहिये । किसने इस स्वप्न में दुश्यजंजाल का निर्माण किया, किसने इसको
जलाया, कोन इसको लाया, किसने इसकी रचना की, किसने इसको विविध पदार्थो से भरा, कौन
इसका उत्पादक है, किसने इसे प्रकट किया, इसका क्या स्वरूप है ओर क्या आकार-प्रकारहे ? यानी
स्वप्नदश्य के समान ही इसकी संभावना करनी चाहिये इस अभिप्राय को मन में रखकर प्रतिवान्दी से
स्वयं प्रश्न के व्याज से श्रीवसिष्ठजी ने श्रीरामचन््रजी के प्रश्न का उत्तर दिया