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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, Verses 15–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, verses 15–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 201 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

परिनिर्वामि शाम्यामि जाग्रदेव जगत्स्थितौ । अस्वप्नमपुनर्बोधं स्वपिमीव निरामयम् ॥ १५ ॥ आशाविधुरितामात्मसंस्थितिं प्राक्तनीं तनौ । प्रविहस्य स्फुरत्सूक्तैः स्वस्थस्तिष्ठाम्यसंशयम् ॥ १६ ॥ नोपदेशेन नार्थेन न शास्त्रैर्न च बन्धुभिः । त्यागेन च न चैतेषामधुना मम कारणम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रचुर भांकार से भासुर, देववृन्द ओर चारणो से परिवृत्त, पुष्पराशि से विभूषित, परिपूर्णं उत्सववाला जगत भी महाराज दशरथ के घर के समान सुशोभित हुआ । देवताओं के नगाड़ों की ध्वनियाँ, सिद्धपुरुषों के साधुवाद के शब्द तथा पुष्पराशिर्यो धीरे-धीरे वैसे ही दिगन्त में पहुँची जैसे कि सागर मेँ कल्लोल तटवर्ती पर्वत के समीप पहुँचती है उस समय देवताओं के पुष्पवर्षा के उद्योग के कोलाहल के क्षणभर में शान्त होने पर सिद्ध पुरुषों के ये वाक्य अभिव्यक्त हुए