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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, Verses 1–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, verses 1–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 201 · श्लोक 1-14

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । अथार्वाक्साधुवादेषु प्रशान्तेषु शनैःशनैः । ज्ञानोपदेशमासाद्य प्रोल्लसत्स्विव राजसु ॥ १ ॥ प्रशान्तसंसृतिभ्रान्तौ जने चरितमात्मनः । स्वयं हसति चित्तेन सत्यं समनुधावता ॥ २ ॥ वलच्चित्तकलं ज्ञानसमास्वादनतत्परे । विवेकिनि सभालोके शान्ते ध्यानमिवास्थिते ॥ ३ ॥ बद्धपद्मासने रामे सभ्रातरि गुरोः पुरः । स्थिते कृताञ्जलौ दीप्तगुरुवक्रगतेक्षणे ॥ ४ ॥ पार्थिवे किमपि ध्यानमिवास्वादयति स्थितिम् । जीवन्मुक्तात्मिकामन्तरादिमध्यान्तपावनीम् ॥ ५ ॥ ग्रहीतुमर्चां भक्तानां मानितार्थजनो मुनिः । तूष्णीं क्षणमिव स्थित्वा प्रोवाचानाकुलाक्षरम् ॥ ६ ॥ स्वकुलाकाशशीतांशो राम राजीवलोचन । किमन्यदिच्छसि श्रोतुं कथयामिमतेच्छया ॥ ७ ॥ स्थितिं च कीदृशीमेनामद्यानुभवसि स्वयम् । किंरूपमिदमाभासं जागतं वद पश्यसि ॥ ८ ॥ इत्युक्ते मुनिना तेन प्राह राजकुमारकः । अविह्वलं मृदु स्पष्टं गुरोरालोकयन्मुखम् ॥ ९ ॥ श्रीराम उवाच । त्वत्प्रसादेन यातोऽस्मि परां निर्मलतां प्रभो । शान्ताशेषकलङ्काङ्कं शरदीव नभस्तलम् ॥ १० ॥ सर्वा एवोपशान्ता मे भ्रान्तयो भवभङ्गदाः । स्वरूपेणावदातेन तिष्ठाम्यच्छमिवाम्बरम् ॥ ११ ॥ स्थितोऽहं गलितग्रन्थिः शान्ताशेषविशेषणः । स्फटिकालयमध्यस्थस्फटिकामलधीरहम् ॥ १२ ॥ अन्यच्छ्रोतुमथाहर्तुं शान्तं नेच्छति मे मनः । परां तृप्तिमुपायान्तं सुषुप्तमिव संस्थितम् ॥ १३ ॥ शान्ताशेषपरामर्शं विगताशेषकौतुकम् । संत्यक्ताशेषसंकल्पं शान्तं मम मुने मनः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

से पूर्ण रन्प्रवाले कीचकं की (एक प्रकार के बाँसों की) ध्वनि के समान मधुर थी । सनकादि सिद्ध पुरुषों के साधुवाद के (धन्यवाद के) साथ सहसा देवताओं के नगाड़े गहगहाने लगे । उन्होने अपनी गहरी प्रतिध्वनियों से पर्वतो को पूर्ण कर दिया । देवताओं के नगाड़े बजाने के साथ ही साथ निरवच्छिन्न गिर रहे हिमपात के समान मनोमोहक पुष्पवृष्टि दसों दिशाओं से होने लगी । इतनी प्रचुर पुष्पवृष्टि हई कि उसने दिडमण्डल को आच्छादित कर दिया, ढक दिया । साधुवाद सहित देवताओं के नगाड, तूरी आदि के शब्द का ओर फूलों की निरवच्छिन्न वृष्टि की ध्वनि का समुदाय, जिसने फूलों की वृष्टि से सभामंच को खचाखच भर दिया था, शब्दों से पर्वत की गुफाएँ भर दी थीं, फूलों के पराग से आकाश को रग दिया था ओर सुगन्ध से पवन में महक भर दी थी, खूब सुशोभित हुआ । पूर्वोक्त शब्दराशि ऊपर की ओर टकटकी लगाये हुए सकल सभासदों की नेत्ररश्मियों से कुछ श्यामरंग की-सी मालूम होती थी, भोचक्के-से होकर ऊपर को कान उठाये हुए मृग, हाथी, घोडे, पशु-पक्षी आदि उसे सुनते थे, विस्मय ओर भय से ऊपर को दृष्टि लगाये हुए बालक तथा स्त्रीजन उसे देखते थे तथा राजा के चाकरवर्ग आश्चर्य से प्रसन्नवदन हो उसपर दृष्टिपात करते थे। पुष्पराशि की निरवच्छिन्न वृष्टि से संमिश्रित, शब्दशोभा से उल्लसित, उत्सव से पृथिवी ओर अन्तरिक्ष का अन्तराल अपूर्वं चमत्कारपूर्ण हो गया । पुष्पवृष्टिरूपी सफेदी से प्रक्षालित, शब्दायमान प्राणियों से पुण्यशब्दयुक्त आकाश बजाये गये सैंकड़ों शंखो से महाराज दशरथ के राजमहल की समता को प्राप्त हुआ