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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, Verses 18–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, verses 18–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 201 · श्लोक 18-29

संस्कृत श्लोक

साम्राज्यस्याथवा व्योम्नि या स्थितिः क्षोभवर्जिता । तामेवानुभवाम्यत्र मच्चित्तामनपायिनीम् ॥ १८ ॥ खादप्यतितरामच्छं चिदाकाशांशमात्रकम् । जगदित्येव पश्यामि लोचनाद्यङ्गतां गतः ॥ १९ ॥ आकाशमात्रमेवेदं जगदित्येकनिश्चयः । दृश्यनाम्नि नभस्यस्मिन्क्षये जागर्मि चाक्षयः ॥ २० ॥ यथाकामं यथाप्राप्तं यथास्थितमिव स्थितम् । यद्वक्ति तदविघ्नेन करोम्यपगतैषणम् ॥ २१ ॥ न तुष्यामि न हृष्यामि न पुष्यामि न रोदिमि । कार्यं कार्यं करोम्येको भ्रान्तिर्दूरं गता मम ॥ २२ ॥ अन्यतामेतु सर्गोऽयं वातु वा प्रलयानिलः । सौम्यो भवतु वा देशः स्वस्थोऽहं स्वात्मनि स्थितः ॥ २३ ॥ विश्रान्तोस्मि विलक्ष्योस्मि दुर्लक्ष्योस्मि निरामयः । नाशाभिर्बन्धमाप्नोमि मुने खमिव मुष्टिभिः ॥ २४ ॥ यथा तरुगतात्पुष्पाद्गन्धः प्राप्य नभःपदम् । तिष्ठत्येवमहं देहादतीतः संस्थितः समः ॥ २५ ॥ यथैव सर्वे राजानो विहरन्ति यथासुखम् । अप्रबुद्धाः प्रबुद्धाश्च राज्येषु बहुकर्मसु ॥ २६ ॥ शान्तहर्षविषादाशः स्थिरैकसमदर्शनः । स्थित आत्मनि निःशङ्कं तथैव विहराम्यहम् ॥ २७ ॥ सर्वस्योपर्यपि सुखी सुखं नेहामि मे प्रभो । जनसाम्येन तिष्ठामि यथेच्छं मां नियोजय ॥ २८ ॥ बालो लीलामिव त्यक्तशङ्कं संसारसंस्थितिम् । यावद्देहमिमां साधो पालयाम्यमलैकदृक् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

सिद्धो ने कहा : सिद्ध पुरुषों के बीच में कल्पपर्यन्त हजारों बार मोक्षोपायों का हमने खूब व्याख्यान किया ओर दूसरों के मुख से उन्हें खूब सुना, किन्तु उनमें इस तरह के मोक्षोपाय कोई भी न थे | तिर्यग्‌ योनियों कूत्ते, सियार आदि जीव, निसर्गतः जड स्त्रियाँ, बालक, सर्पं सबके सब भगवान्‌ वसिष्ठजी के इस वचन विलास से परम शान्ति को प्राप्त होते हैं, इसमें रत्तीभर भी सन्देह नहीं हे । भगवान्‌ श्रीवसिष्ठजी ने विविध दृष्टान्तो, हेतुओं ओर युक्तियों से जैसे श्रीरामचन्द्रजी को आत्मावबोध कराया वैसा साक्षात्‌ श्रीअरून्धतीजी को भी आत्मावबोध कराते हैं या नहीं इसमें संशय है । इस श्लोक से मुख्याधिकारी रामचन्द्रजी में भगवान्‌ श्रीवस्रिष्ठजी के अतिशय स्नेह की प्रशंसा की गई है । इस मोक्षउपायभूत सदुपदेश से पशु, पक्षी आदि भी त्रिविधदुःखशून्य हो गये हैं, यदि इसे सुनेंगे तो पृथिवी में कोन मनुष्य मुक्त न होंगे हम लोग इस ज्ञानामृत का कर्णरूपी अंजलि से पानकर पूर्ण तथा नूतन हुई सिद्धिवाले होकर परमशोभा को प्राप्त हुए है । इस प्रकार के सिद्धवचनों को सुनते हुए अयोध्यावासी लोगों ने उस सभा को कमलो के पुष्पों की वृष्टि से परिपूर्ण देखा उक्त सभा के छत आदि मन्दार आदि के बड़े बड़ फूलों से आच्छन्न थे, उसके आँगन की भूमि कल्पवृक्ष की लता के गुच्छं से ठसाठस भरी थी, पारिजात के फूलों से सुशोभित भूमितल से वह विराजमान थी, सन्तानक पुष्परूपी महामेघ से सब सभासदां के सिर ओर हाथ व्याप्त थे । शिरोरत्नरूपी विटंग के अग्रभाग में हरि चन्दन के फूल बिखरे थे। उस सभा में जल से भरे हुए लम्बायमान मेघ के तुल्य चँदवा लटक रहा था । इस प्रकार की अपूर्व सभा का अवलोकन कर रहे अयोध्यावासी लोगों ने अत्यन्त विनग्रतापूर्वक प्रचुर साधुवादो से तथा तत्कालोचित प्रशंसावचनों से उद्युक्त होकर प्रणाम सहित कुसुमांजलि से श्रीवसिष्ठजी की पूजा की । इसके पश्चात जब नृपतियों की प्रणाम परम्पराएँ कुछ शान्त हुई तब हाथ में पूजा सामग्री लेकर राजा दशरथ ने मुनि महाराज की पूजा करते हुए कहा