Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 194, Verses 16–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 194, verses 16–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 194 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
भगवन्, सदा ही सब कुछ एक अनन्त मैं
ही हूँ अथवा सब कुछ ओर कुछ भी नहीं तथा सकल उपद्रवो से रहित एक होकर मैं ही हूँ अथवा देश,
काल रूप आधार की अप्रसिद्धि वश मैं कहीं पर नहीं हू इस प्रकार की यह निर्वाण नाम की सकलशान्ति
अति आश्चर्यरूप हे । गुरुवर, जाननेयोम्य परमपुरुषार्थरूप वस्तु को मैं जान चुका हूँ, अज्ञानी पुरुषों
को दुष्पराप्य मोक्षसुख मुझे मिल गया है, संसारअनर्थरूप वस्तु राशियाँ सबकी सब चली गई है । चरम
साक्षात्कार से उदित बोधरूप वह निज स्वरूप मेरा उदित हो गया है जिस स्वरूप में फिर मृत्यु, तिरोधान,
दुःख आदि अनर्थो का नाम-निशान तक नहीं रहता है